Monday, September 12, 2011

भजन : सांवरो कन्हैया मोरे मन में बसो रे

सांवरो कन्हैया मोरे मन में बसो रे
मुरली बजाने वारो मन में बसो रे
मन में बसो रे कान्हा
तन में बसो रे
कारो कन्हैया मेरो मन में बसो रे
अरे तिरछी नजरिया वारो मन में बसो रे
माखन चुराने वारो मन में बसो रे

जमुना किनारे वो तो मुरली बजाये
गोपियन संग वो तो रास रचाए
मीठी मीठी तान सुनाये जादू डारे
अरे पीले पीताम्बर वारो मन में बसों रे
सांवरो सलोनो मेरो मन में बसो रे

गोकुल नगरिया में माखन चुराए
वृन्दावन में वो रास रचाए
मथुरा नगरिया को वो धीर बंधाए
अरे धेनु चराने वारो मन में बसो रे
मधु को रिझाने वारो मन में बसो रे


मीराबाई की रचनाएं


मैं तो गिरधर के रंग राती
सखी री मैं तो गिरधर के रंग राती॥
पचरंग मेरा चोला रंगा दे, मैं झुरमुट खेलन जाती॥
झुरमुट में मेरा सांई मिलेगा, खोल अडम्बर गाती॥
चंदा जाएगा, सुरज जाएगा, जाएगा धरण अकासी।
पवन पाणी दोनों ही जाएंगे, अटल रहे अबिनासी॥
सुरत निरत का दिवला संजो ले, मनसा की कर बाती।
प्रेम हटी का तेल बना ले, जगा करे दिन राती॥
जिनके पिय परदेश बसत हैं, लिखि लिखि भेजें पाती॥
मेरे पिय मो माहिं बसत है, कहूं न आती जाती॥
पीहर बसूं न बसूं सासघर, सतगुरु सब्द संगाती।
ना घर मेरा ना घर तेरा, मीरा हरि रंग राती॥
इस पद के माध्यम से मीराबाई ने कृष्णभक्ति की अप्रतिम भावनाओं को व्यक्त किया है। आत्मा-परमात्मा के मिलन को वह बहुत सहज ढंग से व्यक्त करती है। मीराबाई कहती-सुनो सखी! आत्मा पांच आंतरिक धुनों के रंग में रंगा चोला पहनकर नेत्रों के केंद्र रूपी झुरमुट में खेलने जाती है। कर्मकांड और बाहरी क्रियाओं के वस्त्र उसके अंतर में जाने की राह में बाधाएं उत्पन्न करते हैं। उन्हें वह उतार फेंकती है। फिर अवश्य ही हरि को ढूंढ लेती हे। पांचों तत्व, सूर्य, चंद्र और तारामंडल से भी आगे आत्मा दैवीय मंडलों में भ्रमण करने लगेगी। परमात्मा आत्मा के रूप में निज-शरीर में ही वास करता है। वह प्रेम के दीपक के प्रकाश से ही अंतर में प्रकट होता है। मीराबाई कहती है कि जिनके पति परदेश बसते हैं उनकी प्रियतमा पत्र के माध्यम से संदेश भेजा करती है लेकिन मेरे प्रियतम (परमात्मा) तो मेरे मन (आत्मा) में ही बसते हैं, कहीं आते-जाते नहीं।
प्यारे दर्शन दीजो आय
प्यारे दर्शन दीजो आय, तुम बिन रह्ययो न जाय।
जल बिन कमल, चंद बिन रजनी, ऐसे तुम देख्यां बिन सजनी॥
आकुल व्याकुल फिरूं रैन दिन, विरह कलेजा खाय॥
दिवस न भूख नींद नहिं रैना, मुख के कथन न आवे बैनां॥
कहा करूं कुछ कहत न आवै, मिल कर तपत बुझाय॥
क्यों तरसाओ अतंरजामी, आय मिलो किरपा कर स्वामी।
मीरा दासी जनम जनम की, परी तुम्हारे पायं॥
विरह वेदना में तडपती मीरा हरि के दर्शन को उतावली है। बिना हरि दर्शन के वह हमेशा बेचैन रहती है। प्रभु के दर्शन की इच्छा ने उसकी भूख, प्यास और नींद भी छीन ली है। मीरा समझ नहीं रही कि कैसे वह अपनी व्यथा का वर्णन करे। गिरधारी से क्या छिपा है। मीरा याचक बनकर कहती है कि हे प्रभु! मेरे दुख और संताप को देखकर अब तो चले आओ।
आवन की मनभावन की
कोई कहियौ रे प्रभु आवन की, आवन की मन भावन की।
आप न आवै लिख नहिं भेजै, बांण पडी ललचावन की।
ऐ दोई नैणा कह्यौ नहिं मानैं, नदियां बहै जैसे सावन की।
कहा करूं कछु नहिं बस मेरो, पांख नहिं उड जावन की।
मीरा कहै प्रभु कब रै मिलोगे, चेरी भई हूँ तेर दावंण की॥
मीरा अपने प्रीतम श्रीकृष्ण की याद में तडप रही है। वह कहती है कि हे ईश्वर न तो स्वयं आप मेरी- सुधि लेते हैं और न ही कोई संदेश भेजते हैं। मुझे प्रतीत होता है कि आपको मुझे सताने की आदत सी पड गई है। मीरा कहती है कि उसका कोई वश नहीं चलता है। पंख होता तो अवपे प्रियतम से मिलने के लिये उडकर चली आती।
चरण कंवल अवणासी
भज मन चरण कंवल अवणासी।
जेताई दीसां धरण गगन मां, तेताई उठ जासी।
तीरथ बरतां ग्यांण कथंता, कहा लियां करवत कासी।
यो देही रो गरब णा करणा माटी मां मिल जासी।
यो संसार चहर री बाजी, सांझ पड्यां उठ जासी।
कहां भयां थां भगवां पहर्यां, घर तज लयां सन्यासी।
जोगी होयां जुगत णां जाणा, उलट जणम फिर फांसी।
अरज करा अबला कर जोरया, स्याम तुम्हारी दासी।
मीरा रे प्रभु गिरधरनागर, काट्यां म्हारो गांसी॥
मीराबाई जगत् की मिथ्या से पूरी तरह परिचित थीं। ईश्वर को एकमात्र सहारा माननेवाली मीराबाई कहती हैं कि-हे मेरे मन, तू निरंतर अविनाशी के चरणकमलों की वंदना कर। इस धरती व गगन में जो कुछ दीख रहा है, वह सब नाशवान है। तीर्थयात्राएं, व्रत या ज्ञान चर्चा करना अथवा काशी में जाकर आश्रय लेना व्यर्थ है। बस, मन से वंदना करना ही पर्याप्त है। इस देह पर कभी गर्व मत करना, यह तो एक दिन मिट्टी में मिल जानी है। इस संसार को तो यों जान, जैसे यह चिडिया की बाजी (खेल) हो, जिसे सांझ पडते ही उड जाना है। क्या हुआ जो तूने भगवा धारण कर लिया या घर त्याग कर संन्यास ले लिया। इससे मुक्ति नहीं मिलती, मुक्ति के लिए मन से वंदना करना ही पर्याप्त है। ऐसे जोगी होने का क्या तुक कि सिद्धि की विधि ही नहीं जानी जा सके और जन्म-जन्मांतर के आवागमन की फांसी गले में लगी रहे। हे श्याम! मैं तुम्हारी दासी हूँ, मुझ पर दया दृष्टि बनाए रखना। हे मीरा के प्रभु गिरधरनागर! तुम्हीं दुनियादारी के बंधनों को काट कर मुझे मुक्त कर देना।
राम नाम रस पीजै
राम नाम रस पीजै, राम नाम रस पीजै।
तज कुसंग सतसंग बैठ नित, हरि चरचा सुण लीजै।
काम क्रोध मद लोभ मोह कूं बहा चित्त से दीजै।
मीरा रे प्रभु गिरधरनागर, ताहि के रंग भीजै॥
मीरा जन-जन को परामर्श देती है कि तुम राम नाम का रस पियो, इसका बडा चमत्कारी परिणाम होता है। नित्य कुसंगत का त्याग करके सत्संग में जाकर बैठो और हरि चर्चा सुनकर जीवन को सार्थक बनाओ। चित्त में काम, क्रोध, मद, लोभ और मोह की जो कुप्रवृतियां घर कर गई हैं, उनको वहाँ से बहाकर निर्मल हो जाओ। हे मीरा के प्रभु गिरधरनागर! मैं तो तुम्हारे रंग में भीग गई हूँ।
दरद न जाण्यां कोय
हेरी म्हां दरदे दिवाणी म्हारां दरद न जाण्यां कोय।
घायल री गत घाइल जाण्यां, हिवडो अगण संजोय।
जौहर की गत जौहरी जाणै, क्या जाण्यां जिण खोय।
दरद की मार्यां दर दर डोल्यां बैद मिल्या नहिं कोय।
मीरा री प्रभु पीर मिटांगां जब बैद सांवरो होय॥
भगवान् के प्रेम में व्याकुल होकर मीराबाई कहती हैं कि- हे सखी! मुझसे विरह की पीडा सही नहीं जाती। मैं विरह के मारे दीवानी हुई जा रही हूँ किंतु मेरे दर्द को कोई समझ नहीं पाता। इसे तो वही समझ सकता है, जिसके हृदय में विरहाग्नि सुलग रही हो। मुझ घायल की गति तो कोई घायल ही समझ सकता है। जौहरी ही रत्‍‌न का मूल्यांकन कर सकता है, वह क्या करेगा जिसने अपना रत्‍‌न गंवा दिया हो। मैं वियोग में दर्द की मारी-मारी दर-दर डोल रही हूँ, किंतु ऐसा कोई वैद्य नहीं मिला जो मेरा इलाज कर सके। हे मीरा के प्रभु! मेरी पीडा तो तभी मिटेगी जब मेरा सांवरा वैद्य कृष्ण आकर मेरा इलाज करेगा।
हरि नाम लौ लागी
अब तो हरि नाम लौ लागी।
सब जग को यह माखनचोर, नाम धर्यो बैरागी।
कहं छोडी वह मोहन मुरली, कहं छोडि सब गोपी।
मूंड मुंडाई डोरी कहं बांधी, माथे मोहन टोपी।
मातु जसुमति माखन कारन, बांध्यो जाको पांव।
स्याम किशोर भये नव गोरा, चैतन्य तांको नांव।
पीताम्बर को भाव दिखावै, कटि कोपीन कसै।
दास भक्त की दासी मीरा, रसना कृष्ण रटे॥
मीराबाई कहती हैं कि-अब तो मैंने हरि के नाम से लगन लगा ली है। सारे जग में वह माखनचोर के नाम से विख्यात है जबकि उसे वैरागी कहा जाता है। पता नहीं वह अपनी मोहक मुरली कहाँ छोड आया और उसकी सारी गोपियां कहा गई। सिर मुंडवा कर न जाने कहाँ डोर बांधी, अब माथे पर मन मोहने वाली टोपी भी नहीं है। कभी वह खूब माखन चुराता था, इस कारण माता यशोमती उसके पांव बांधती थी। वही श्याम किशोर अब गोरे हो गए और उनका नाम चैतन्य हो गया। उनके पीतांबर को भाव दिखाकर कमर पर कौपीन (लंगोटी) कस लिया। मीरा तो भक्तों के दास हरि की दासी है, मेरी जिह्वा सदा उसी का नाम रटती है।
राम रतन धन पायो
पायो जी म्हे तो रामरतन धन पायो।
बस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरु, किरपा को अपणायो।
जनम जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो।
खरचै नहिं कोई चोर न लेवै, दिन-दिन बढत सवायो।
सत की नाव खेवहिया सतगुरु, भवसागर तर आयो।
मीरा के प्रभु गिरधरनागर, हरख-हरख जस पायो॥
भक्ति की महिमा का गुणगान करते हुये मीराबाई कहती हैं कि - मैंने तो रामनाम के रत्‍‌नों का धन पा लिया। मेरे सतगुरु ने मुझे कृपापूर्वक यह अनमोल वस्तु प्रदान की है जिसे मैंने खुशी-खुशी अपना लिया। जनम-जनम की पूँजी क्या पा गई हूँ कि जग की सारी मोह-माया न जाने कहां लुप्त हो गई। यह पूँजी कभी खर्च नहीं होगी और न ही कोई चोर उठा कर ले जाएगा, बल्कि दिन ब दिन इसमें सवाया वृद्धि होती है। सत्य की नाव का खेवनहार सतगुरु होता है, इस प्रकार मैंने भवसागर पार कर लिया। हे मीरा के प्रभु गिरधरनागर! तुम्हारी माया अपरंपार है। तुम्हारा यशगान करते हुए मैं अत्यंत हर्षित होती हूँ।
हरि चरणन की चेरी
पलक न लागै मेरी स्याम बिना।
हरि बिनू मथुरा ऐसी लागै, शशि बिन रैन अंधेरी।
पात पात वृन्दावन ढूंढ्यो, कुंज कुंज ब्रज केरी।
ऊंचे खडे मथुरा नगरी, तले बहै जमना गहरी।
मीरा रे प्रभु गिरधरनागर, हरि चरणन की चेरी।
मीराबाई कहती हैं कि - हे मेरे श्याम! तुझसे ऐसी लगन लगी है कि तेरे वियोग में मेरी पलकें एक पल को भी नहीं झपकतीं। हरि के बिना मुझे मथुरा नगरी ऐसी लगती है जैसे चंद्र के बिना रात को अंधेरा छा गया हो। मैंने वृंदावन जाकर पत्ते-पत्ते में उसे ढूंढा और ब्रज जाकर कुंज-कुंज में झांक लिया, मगर वह मुझे कहीं भी नहीं मिला। मथुरा नगरी ऊंचाई पर खडी है और उसके नीचे गहरी यमुना नदी बह रही है। हे मीरा के प्रभु गिरधरनागर! मैं तो हरि के चरणों की दासी हूँ, अत: मुझे दर्शन देकर कृतार्थ करो।
म्हारा जीवन प्राण अधार
हरि म्हारा जीवन प्राण अधार।
और आसिरो णा म्हारा थें बिण, तीनूं लोक मंझार।
थें बिण म्हाणो जग ण सुहावां, निरख्यां सब संसार।
मीरा रे प्रभु दासी रावली, लीज्यो णेक णिहार॥
मीरा इस सत्य को भरीभाँति जानती थी कि ईश्वर ही सभी जीवों के प्राण के आधार हैं। वह कहती है कि मेरे हरि, तू ही मेरे जीवन व प्राण का आधार है, तेरे बिना मैं निराश्रित हूँ। सच कहती हूँ, इन तीन लोकों में तुम्हारे बिना मेरा कोई अन्य आसरा है ही नहीं, तुम्हारे बिना मुझे यह जग नहीं सुहाता। मैंने सारा संसार देख लिया, एक तुम्हीं मेरे सर्वस्व हो, अन्यत्र कहीं मन नहीं लगता। हे मीरा के प्रभु गिरधरनागर! यह दासी केवल तुम्हारी है, अत: मेरा हाल-चाल लेने के लिये मेरी ओर भी निहार लेना।
हरि बिन कछू न सुहावै
परम सनेही राम की नीति ओलूंरी आवै।
राम म्हारे हम हैं राम के, हरि बिन कछू न सुहावै।
आवण कह गए अजहुं न आये, जिवडा अति उकलावै।
तुम दरसण की आस रमैया, कब हरि दरस दिलावै।
चरण कंवल की लगनि लगी नित, बिन दरसण दुख पावै।
मीरा कूं प्रभु दरसण दीज्यौ, आंणद बरण्यूं न जावै॥
मीराबाई कहती है कि-परमस्नेही की रीति-नीति की मुझे बहुत याद आती है। राम हमारा और हम राम के हैं, एक-दूसरे के एकदम अभिन्न। सच तो यह है कि हरि के बिना कुछ भी नहीं सुहाता। मुझसे आने की कह गए थे, किंतु समझ में नहीं आता, अब तक क्यों नहीं आए। उनके बिना हृदय बहुत आकुल रहता है। मेरे रमैया, तुम्हारे दर्शनों की आस में हूँ, पता नहीं हरि कब दर्शन दिलाएंगे। नित्य चरणकमल से लगन लगाए बैठी हूँ और तुम्हारे दर्शन के बिना दुख पा रही हूँ। हे मीरा के प्रभु! दर्शन दो, तुम्हारे दर्शन से जो आनंद मिल सकता है, उसका मैं बखान नहीं कर सकती।
होली खेल्या स्याम संग
रंग भरी राग भरी रागसूं भरी री।
होली खेल्या स्याम संग रंग सूं भरी, री।
उडत गुलाल लाल बदला रो रंग लाल, पिचकां उडावां।
रंग रंग री झरी, री।
चोवा चन्दण अरगजा म्हा, केसर णो गागर भरी री।
मीरा दासी प्रभु गिरधरनागर, चेरी चरण धरी री।
मीराबाई अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के साथ होली खेलना चाहती है। उनकी इच्छा है कि रंग, रास और प्रीत भरी मैं श्याम के संग होली खेलूं और रंगों से नहाऊं। चतुर्दिक लाल गुलाल उड रहा है और बादलों का रंग भी लाल हो गया है पिचकारियों से रंग उड रहे हैं। जहाँ देखो, वहाँ रंग-ही-रंग की झडी लगी हुई है। मेरी गागर में चोवा, चंदन, अरगजा और केसर की सुंगधियां भरी हुई हैं। मीरा तो गिरधरनागर की दासी है। इस दासी ने तेरे चरणों की शरण ली है। प्रभु अपनी कृपादृष्टि बनाए रखना।
कोई कहै कुलनासी
मेरे मन राम बसी।
तेरे कारण स्याम सुन्दर, सकल जोगां हांसी।
कोई कहै मीरा भई बावरी, कोई कहै कुलनासी।
कोई कहै मीरा दीप आग री, नाम पिया सूं रासी।
खांड धार भक्ति की न्यारी, काटी है जम की फांसी॥
मीरा कहती हैं-मेरे मन में राम बसा हुआ है। मेरे श्यामसुंदर, तेरे कारण जग वाले मेरी हंसी उडाते हैं। कोई कहता फिरता है कि मीरा बावरी हो गई है तो कोई यहाँ तक कह देता है कि मीरा कुल-नाशी है। कोई कहता है कि मीरा अग्नि की भाँति दहक रही है। जिसको जो कहना है कहता रहे, मैं तो अपने पिया का नाम लेने में ही लीन हूँ। यह जो भक्ति की तलवार की धार है, उसकी शान निराली है। यही यम के फंदे से सदैव के लिए मुक्ति दिला देती है अर्थात मोक्ष प्राप्त कराती है।
होरी खेरत गिरधारी
होरी खेरत है गिरधारी।
मुरली चंग बजत डफ न्यारो, संग जुबति व्रजनारी।
चन्दन केसर छिरकत मोहन, अपने हाथ बिहारी।
भरि भरि मूठि गुलाल लाल चहुं, देत सबन पै डारी।
छल छबीले नबल कान्ह संग, स्यामा प्राण प्यारी।
गावत चार धमार राग, तैंहू दै दै कल करतारी।
फागु जू खेलत रसिक सांवरो, बाढ् यो रस ब्रज भारी।
मीरा रे प्रभु गिरधरनागर, मोहन लाल बिहारी॥
कृष्ण की अप्रतिम भक्ति से ओतप्रोत मीरा अपने प्रियतम के होली खेलने का आनंद ले रही है। वह कहती हैं-मेरा गिरधारी होली खेल रहा है। मुरली, चंग और डफ के निराले स्वर गूंज रहे हैं, इनकी ताल पर ब्रज की युवतियां व नारियां गा और नाच रही हैं। अपने ही हाथों से मोहन बिहारी चंदन व केसर छिडक रहा है। अपनी मुट्ठियों में लाल गुलाल भर-भर कर चारों ओर सब पर डाल रहा है। छैल-छबीले नवल कान्हा के साथ प्राण प्यारी राधा भी हैं। सब हाथों से तालियाँ बजा-बजाकर धमार राग की धुन पर गा रहे हैं। रसिक सांवरा झूम-झूमकर जिस विधि से फाग खेल रहा है उसके कारण ब्रज में भारी उल्लास छा गया है। हे मीरा के प्रभु गिरधरनागर! कान्हा की छवि बडी अद्भुत है। वह मोहने वाला है, वह लाल भी है। उसकी आभा आरुणिक है और वह बिहारी भी है, यानी रस छिडकता चलता है।
जागो मोरे प्यारे
जागो बंसी वारे ललना, जागो मोरे प्यारे।
रजनी बीती भोर भयो है, घर घर खुले किंवारे।
गोपी दही मथत सुनियत है, कंगना के झनकारे।
उठो लाल जी मेरे भोर भयो है, सुर नर ठाढे द्वारे।
ग्वाल बाल सब करत कुलाहल, जय जय सबद उचारे।
माखन रोटी हाथ में लीनी, गउवन के रखवारे।
मीरा रे प्रभु गिरधरनागर, सरण आयां कूं तारे॥
बालकृष्ण के मनमोहक छवि को अपने मन में बसाकर मीराबाई ने इस पद की रचना की। जागो मेरे बंसीवाले लाल, जागो मेरे प्यारे। रात बीत गई और सुबह हो गई है। घर-घर के दरवाजे खुल गए हैं और लोग काम-काज में जुट गए हैं। गोपियां दही मथ रही हैं। उनके कंगनों की झंकार सुनाई देती है। उठो मेरे लालजी, सुबह हो गयी है। तुम्हारे द्वार पर देवता व मनुष्य दर्शनों के लिये खडे हैं। सारे ग्वाल-बाल जमा होकर कोलाहल कर रहे हैं और तुम्हारी जय-जयकार के नारे लगा रहे हैं। गऊओं के रखवाले, मैं तुम्हारे लिए हाथों में माखन-रोटी लेकर खडी हूँ, जल्दी से उठकर आ जाओ। हे मीरा के प्रभु गिरधरनगार! जो तुम्हारी शरण में आता है तुम उसे अवश्य तारते हो।
म्हारां री गिरधर गोपाल
म्हारां री गिरधर गोपाल दूसरां णा कूयां।
दूसरां णां कूयां साधां सकल लोक जूयां।
भाया छांणयां, वन्धा छांड्यां सगां भूयां।
साधां ढिग बैठ बैठ, लोक लाज सूयां।
भगत देख्यां राजी ह्यां, ह्यां जगत देख्यां रूयां
दूध मथ घृत काढ लयां डार दया छूयां।
राणा विषरो प्याला भेज्यां, पीय मगण हूयां।
मीरा री लगण लग्यां होणा हो जो हूयां॥
भगवत् प्रेम में मगन मीराबाई कहती हैं कि-मेरे तो बस एक गिरधर गोपाल ही हैं, दूसरा कोई नहीं है। मैंने सारा संसार छान मारा, किंतु उसके जैसा मुझे कोई और नजर नहीं आया। उसने मुझे इस प्रकार वशीभूत कर लिया कि मैंने भाई-बंधु और सारे सगे-संबंधियों तक को छोड दिया। साधुओं के साथ बैठ-बैठकर लोक-लाज भी त्याग दी। भक्त पर नजर पडते ही हर्ष होता है। जगत की अफरातफरी देखकर मन खिन्न होता है। मैंने तो दूध मथकर घी निकाल लिया और छाछ फेंक दी है। राणा ने विष का प्याला भेजा तो उसे पीकर मैं मगन हो गई हूँ। मीरा ने तो गिरधर गोपाल से लगन लगा ली, अब तो जो होना हो, होने दो।
णेणण (नयनन) मां नंदलाल
बास्यां म्हारे णेणण मां नंदलाल।
मोर मुगट मकराक्रत कुण्डल अरुण तिलक सोहां भाल।
मोहण मूरत सांवरां सूरत णेणा बण्या बिसाल।
अधर सुधारस मुरली राजां उर बैजंतीमाल।
मीरा प्रभु संतां सुखदायां भक्त बछल गोपाल॥
मीराबाई अपने प्रियतम नंदलाल को अपनी आँखों में बसने का आग्रह करती है। कृष्ण के प्रेम में भाव-विभोर मीराबाई के दृश्य पटल पर हरि का मनमोहक रूप आता है। कृष्ण के सिर पर मोर-मुकुट, कानों में मकराकार के कुंडल व ललाट पर लाल तिलक शोभायमान हैं। मूरत मोहनी, सूरत सांवरी और आंखें विशाल हैं। अधरों पर सुधारस-सी मुरली और हृदय पर वैजयंती माला विराजमान है। हे मीरा के प्रभु! तुम सदैव संतों को सुख देते हो। हे गोपाल! तुम सचमुच भक्त वत्सल हो।
लियो रमैया मोल
माई मैं तो लियो रमैया मोल।
कोई कहै छानी, कोई कहै चोरी, लियो है बजता ढोल।
कोई कहै कारो, कोई कहै गोरो, लियो है अखीं खोल।
कोई कहै हल्का, कोई कहै महंगा, लियो है तराजू तोल।
तन का गहना मैं सबकुछ दीन्हा, दियो है बाजूबन्द खोल।
मीरा रे प्रभु गिरधरनागर, पूरब जनम का कोल॥
भक्ति की पराकाष्ठा का परिचायक है यह पद। भगवान् तो हमेशा भक्त के वश में होते हैं। मीरा कहती है कि-मैंने तो रमैया को मोल लिया है। कोई कहता है कि मैंने लुक-छिप कर मोल लिया है। कोई कहता है कि चोरी की है, जबकि मैंने ढोल बजाकर खुलेआम लिया है। कोई कहता है रमैया काला है, कोई कहता है कि गोरा है, जबकि कान खोलनकर भलीभाँति परख लिया है। कोई कहता है कि हलका है, कोई कहता है कि महंगा है, जबकि मैंने तराजू में तौलकर लिया है। जिसके पास रमैया हो उसे किसी और चीज की आवश्यकता नहीं होती। अत: मैंने तन के गहने रमैया के बदले में दे दिए। बाजूबंद भी खोल दिया है। हे मीरा के प्रभु गिरधरनागर! तुम पूर्वजन्म का वचन निभाते हुए मेरी लाज रख लो।
झूठी जगमग जोति
आवो सहेल्या रली करां हे, पर घर गावण निवारि।
झूठा माणिक मोतिया री, झूठी जगमग जोति।
झूठा सब आभूषण री, सांचि पियाजी री पोति।
झूठा पाट पटंबरारे, झूठा दिखणी चीर।
सांची पियाजी री गूदडी, जामे निरमल रहे सरीर।
छप्प भोग बुहाई दे है, इन भोगिन में दाग।
लूण अलूणो ही भलो है, अपणो पियाजी को साग।
देखि बिराणै निवांण कूं हे, क्यूं उपजावै खीज।
कालर अपणो ही भलो है, जामें निपजै चीज।
छैल बिराणे लाख को हे अपणे काज न होइ।
ताके संग सीधारतां हे, भला न कहसी कोइ।
वर हीणों आपणों भलो हे, कोढी कुष्टि कोइ।
जाके संग सीधारतां है, भला कहै सब लोइ।
अबिनासी सूं बालवां हे, जिपसूं सांची प्रीत।
मीरा कूं प्रभु मिल्या हे, ऐहि भगति की रीत॥
जगत् के मिथ्या स्वरूप से भलीभाँति परिचित मीरा अपनी सखियों को भी यह राज बताना चाहती हैं। वह कहती है-आओ सहेलियों, हम खेले-कूदें, पराये घर आने-जाने का परित्याग करें। अपनी आत्मा का मंथन करें ताकि काया के आवागमन का सिलसिला समाप्त हो। ये माणिक-मोती सब मिथ्या हैं। जगमग करती ज्योति भी मिथ्या है। भौतिक पदार्थो में उलझने का कोई लाभ नहीं है। सबकुछ नाशवान है। ये सारे आभूषण भी मिथ्या हैं। सच है तो सिर्फ पिया यानी भगवान् की प्रीति। ये रेशमी कपडे व दक्षिणी साडियां भी मिथ्या हैं। बस पियाजी की गूदडी ही सच है, जिसमें शरीर निर्मल बना रहता है। छप्पन भोगों का त्याग करो, इन भोगों से दाग लगता है। अपने पिया जी का नमक या बिना नमक का साग ही भला है। दूसरे की घी चुपडी रोटी देखकर खीजना नहीं चाहिए। अपनी नोनी मिट्टी जमीन ही भली, जिससे कोई चीज तो बनाई जा सकती है। पराया छैल-छबीला लाख का हो किंतु अपने काम का नहीं होता। उसके साथ मेल-जोल किया जाए तो उसे कोई भला नहीं कहता। अपना वर चाहे हीन, कोढी या कुष्ठ रोगी ही क्यों न हो, वही भला होता है। उसके साथ मेल-जोल किया जाए तो सब उसे भला कहते हैं। मेरे बालम तो अविनाशी हैं। उसकी प्रीत सच्ची है। मीरा को तो प्रभु मिल गया, वही मेरा सर्वस्व है, उसकी प्रीत मुझे भली लगती है। बाकी सबकुछ मिथ्या है, यही भक्ति की रीत भी है।
नित उठ दरसण जास्यां
माई म्हां गोविन्द, गुण गास्यां।
चरणम्रति रो नेम सकारे, नित उठ दरसण जास्यां।
हरि मन्दिर मां निरत करावां घूंघर्यां छमकास्यां।
स्याम नाम रो झांझ चलास्यां, भोसागर तर जास्यां।
यो संसार बीडरो कांटो, गेल प्रीतम अटकास्यां।
मीरा रे प्रभु गिरधरनागर, गुन गावां सुख पास्यां॥
मीरा कहती हैं कि मेरी माई, लोग कुछ भी कहते रहें, मैं तो सदा गोविंद के गुण ही गाऊंगी। चरणामृत का नियम निभाने नित्य प्रात:काल उठकर उसके दर्शन करने जाया करूंगी। हरि मंदिर में जाकर नृत्य करूंगी और घुंघरू छमकाऊंगी। श्याम नाम का झांझ बजाऊंगी और इस प्रकार भवसागर तर जाऊंगी। यह संसार तो मुझे बेरी के कांटों-सा चुभता हुआ प्रतीत होता है। प्रीतम मुझे ऐसे संसार में अटकाकर न जाने कहां चला गया है। हे मीरा के प्रभु गिरधरनागर! तेरे गुण गाते हुए मुझे सुख की प्राप्ति होती है, मैं तो सदा तेरे गुण गाऊंगी।
चरण कमल लपटाणी
राणाजी ने जहर दियो म्हे जाणी।
जैसे कन्चन दहत अगनि मे, निकसत बाराबाणी।
लोकलाज कुल काण जगत की, दइ बहाय जस पाणी।
अपणे घर का परदा करले, मैं अबला बौराणी।
तरकस तीर लग्यो मेरे हियरे, गरक गयो सनकाणी।
सब संतन पर तन मन वारों, चरण कंवल लपटाणी।
मीरा को प्रभु राखि लई है, दासी अपणी जाणी॥
मीराबाई कहती हैं कि राणा जी, आपने मुझे जहर दिया था, यह मैं जानती हूँ। इसके बावजूद मैंने उसे चुपचाप पी लिया। फिर क्या हुआ? जैसे सोना आग में जलकर चमकता हुआ बाहर निकलता है, उसी प्रकार जहर पीकर मेरी प्रीत और अधिक प्रगाढ व हार्दिक बन गई। अब मेरे लिए जगत की लोक-लाज और कुल के सम्मान का कोई महत्त्‍‌व नहीं रहा। मैंने इन सबको वैसे ही बहा दिया है जैसे पानी का रेला बहा दिया। राणाजी मैं तो कहती हूँ कि अपने घर का परदा कर लो, मेरा कोई भरोसा नहीं, मैं अबला बौरा गई हूँ। मेरी कौन-सी हरकत तुम्हारे कुल को आहत कर दे, मैं नहीं जानती। हरि प्रीत के तरकस का तीर मेरे हृदय में बिंध गया है और मैं पगला गई हूँ। मैंने अपना तन-मन, सर्वस्व संतों पर वार दिया है और हरि के चरणकमलों से लिपट गई हूं। हे मीरा के प्रभु! मुझे अपनी दासी जानकर अपने चरणों में स्थान दे दो, अब और कहीं मन नहीं लगता।
गिरधर के घर जाऊँ
मैं तो गिरधर के घर जाऊं।
गिरधर म्हांरो सांचो प्रीतम, देखत रूप लुभाऊं।
रैण पडै तब ही उठि जाऊं, भोर गये उठि आऊं।
रैणदिना बाके सेंग खेलूं, ज्यूं त्यूं वाहि रिझाऊं।
जो पहिरावै होई पहिरूं, जो दे सोई खाऊं।
मेरी उणकी प्रीत पुरानी, उण बिन पल न रहाऊं।
जहां बैठावें तितही बैठूं, बेचे को बिक जाऊं।
मीरा रे प्रभु गिरधरनागर, बार बार बलि जाऊं॥
कृष्ण के प्रेम सरोवर में डूबी मीरा कहती हैं कि मैं तो गिरधर के घर जाती हूँ। गिरधर मेरा सच्चा प्रेमी है। उसे देखते ही उसके रूप से मैं लुब्ध हो जाती हूँ। रात होते ही मैं उसके घर जाती हूँ और सुबह होते ही वहाँ से उठकर घर वापस आती हूँ। दिन-रात उसी के संग खेलती हूँ। मैं हर प्रकार से उनको प्रसन्न रखने का प्रयास करती हूँ। जो वह पहनने को देता है वही पहनती हूँ। जो खाने को देता है वही खाती हूँ, मेरी उसकी पुराणी प्रीत है। उसके बिना एक पल भी नहीं रहा जाता। वह जहाँ बिठाता है, वहीं बैठती हूँ। वह मुझे बेचना भी चाहे तो मैं चुपचाप बिक जाऊंगी। हे प्रभु गिरधरनागर! तुम पर मैं बार-बार बलि जाती हूँ।
अमृत दीन्ह बनाय
मीरा मगन भई हरि के गुण गाय।
सांप पिटारा राणा भेज्यों, मीरा हाथ दिया जाय।
न्हाय धोय जब देखण लागी, सालिगराम गई पाय।
जहर का प्याला राणा भेज्या, अमृत दीन्ह बनाय।
न्याह धोय जब पीवण लागी, हो अमर अंचाय।
सूल सेज राणा ने भेजी, दीज्यो, मीरा सुलाय।
सांझ भई मीरा सोवण लागी, मानो फूल बिछाय।
मीरा रे प्रभु सदा सहाई, राखे बिघन हटाय।
भजन भाव में मस्त बोलती, गिरधर पै बलि जाय॥
मीरा हरि के गुण गाती हुई मगन हो रही है। राणा ने सांप की पिटारी भिजवाई थी और लाने वाले ने जाकर मीरा के हाथों में थमा दी। नहा-धोकर जब वह पिटारी खोलकर देखने लगी तो उसे पिटारी से शालिग्राम की प्राप्ति हुई। राणा ने जहर का प्याला भेजा और बताया कि अमृत है। नहा-धोकर जब उसने उसे पी लिया तो मानो सचमुच अमृत पीकर वह अमर हो गई। राणा ने शूलों की सेज भेजकर कहा कि इस पर मीरा को सुलाना। सांझ को मीरा उस पर सोई तो उसे ऐसा लगा मानो वह फूलों की सेज पर सोई हो। प्रभु मीरा की सदैव सहायता करते हैं और उसके विघनें को टालते रहते हैं। मीरा निश्चित होकर भजन-भाव में मगन होकर डोलती फिरती है और गिरधर पर बलि-बलि जाती है।
नसदिन जोऊ बाट
जोगिया जी निसदिन जोऊ बाट।
पांव न चालै पंथ दूहेलो; आडा औघट घाट।
नगर आइ जोगी रस गया रे, मो मन प्रीत न पाइ।
मैं भोली भोलापण कीन्हो, राख्यौ नहिं बिलमाइ।
जोगिया कूं जोवत बोहो दिन बीत्या, अजहूं आयो नाहिं।
बिरह बुझावण अन्तरि आवो, तपन लगी तन माहिं।
कै तो जोगी जग में नाहीं, केर बिसारी मोइ।
कांइ करूं कित जाऊंरी सजनी नैण गुमायो रोइ।
आरति तेरा अन्तरि मेरे, आवो अपनी जांणि।
मीरा व्याकुल बिरहिणी रे, तुम बिनि तलफत प्राणि॥
प्रभु के प्रेम में मीरा विरहिणी बन चुकी है। वह हमेशा अपने प्रियतम नंदलाल की राह देखा करती है। मेरे जोगिया जी, मैं रात-दिन निरंतर तुम्हारी बाट जोहती हूँ। प्रेम की डगर बडी दुष्कर है, इस आडे और संकरे पथ पर कदम रखना बडे जोखिम का काम है। नगर में जाकर जोगी ऐसा रम गया है कि सुध-बुध खो बैठा और मेरे मन में प्रीत की थाह का अनुमान नहीं लगा सका। मैं भोली थी और भोलापन ही करती रही, इसलिए तो मैं उसे प्रेम में फांस न सकी। जोगी जी, मेरे अंतर में जो विरहाग्नि सुलग रही है, उसे बुझाने को आओ। मेरा सारा शरीर तप रहा है। मुझे तो लगता है कि जोगी जग में कहीं खो गया है, या उसने मुझे भूला दिया है। रात-दिन रो-रोकर मैंने तो अपनी आंखों को ही खराब कर लिया है। मेरा अंतर तुम्हारी चाहत में तडप रहा है, मुझे अपना मानकर आ जाओ। मीरा कहती है कि मैं तुम्हारे दर्शन पाने को व्याकुल विरहिणी हो रही हूँ। तुम जल्दी आन मिलो प्रीतम, तुम्हारे बिना मेरे प्राण तडपते हैं।
मुरली कर लकुट लेऊँ
गोहनें गुपाल फिरूं, ऐसी आवत मन में।
अवलोकन बारिज बदन, बिबस भई तन में।
मुरली कर लकुट लेऊं, पीत बसन धारूं।
काछी गोप भेष मुकट, गोधन संग चारूं।
हम भई गुलफाम लता, बृन्दावन रैना।
पशु पंछी मरकट मुनी, श्रवन सुनत बैनां।
गुरुजन कठिन कानि कासौं री कहिए।
मीरा प्रभु गिरधर मिलि ऐसे ही रहिए॥
मीरा कहती है कि मेरे मन में ऐसा विचार आता है कि सदैव गोपाल के साथ-साथ घूमूं -फिरूं। उसका कमल जैसा मुखडा देख करके मेरा तन विवश हो जाता है। जी करता है कि हाथ में मुरली व छडी लूं और पीले वस्त्र धारण करूं। फिर गोप का वेश बनाकर और सिर पर मुकुट धरकर गोधन (गउओं) के साथ विचरती फिरूं। इस कल्पना से मीरा इतना विमुग्ध होती है कि उसे प्रतीत होता है, वह तो वृंदावन की धूल बन गई है और यहां के पशु, पक्षी, वानर व मुनियों की वाणी अपने कानों में सुन रही है। गुरुजनों की बडी कठोर मर्यादाएं हैं, मैं तो अपने मन की बात उनको बता नहीं सकती। मीरा कहती है कि हे प्रभु, हे मेरे गिरधर! मेरी जैसी कल्पना है, उसी प्रकार मुझसे मिलकर रहिए।
लोक कहें मीरा भई बाबरी
कोई कछु कहो रे रंग लाग्यो, रंग लाग्यो भ्रम भाग्यो।
लोक कहै मीरा भई बाबरी, भ्रम दूनी ने खाग्यो।
कोई कहै रंग लाग्यो।
मीरा साधां में यूं रम बैठी, ज्यूं गूदडी में तागो।
सोने में सुहागो।
मीरा सूती अपने भवन में, सतगुरु आप जगाग्यो।
ज्ञानी गुरु आप जगाग्यो।
कृष्ण के प्रेम में मगन मीरा कहती है कि कोई कुछ भी कहता रहे, मैं तो श्याम के रंग में रंग गई। उसकी प्रीत का गहरा रंग मुझे लग गया है और मेरे सारे भ्रम दूर हो गए हैं। लोग कहते हैं कि मीरा बावरी हो गई है, यह दुनिया का भ्रम है। कोई कहता है कि मीरा को श्याम का रंग लग गया है। वह साधुओं में जाकर यों रम गई है जैसे गुदडी में धागा समाहित होता है या जैसे सोने में सुहागा। मीरा कहती है कि मुझे श्याम के रंग का कहां ज्ञान था। मैं तो अपने भवन में निद्रामग्न थी कि सतगुरु स्वयं आकर मुझे जगा गए। गुरु की कृपा से ही मैं श्याम की प्रीत में रंग गई और मेरे सारे भ्रम भाग गए।
बन-बन बिच फिरूँ री
करणां सुणि स्याम मेरी।
मैं तो होई रही चेरी तेरी।
दरसण कारण भई बावरी बिरह बिथा तन घेरी।
तेरे कारण जोगण हूंगी नग्र बिच फेरी।
कुंज सब हेरी हेरी।
अंग भभूत गले म्रिघ छाला, यो तन भसम करूं री।
अजहूं न मिल्या, राम अबिनासी, बन बन बिच फिरूं री।
रोऊं नित टेरी-टेरी।
जन मीरा कूं गिरधर मिलिया, दुख मेटण सुख भेरी।
रूम रूम साता भई उर में, मिटि गई फेरा फेरी।
रहूं चरननि तरि चेरी॥
कृष्ण की विरहाग्न में डूबी मीरा कती है - हे श्याम! मेरी करुण पुकार सुनो, मैं तो तेरी सदा-सदा की दासी हूँ। तेरा दर्शन पाने को पागल हुई जाती हूँ और विरह की वेदना ने मेरे तन को घेर लिया है। तेरे कारण मैं जोगन बन गई हूं और नगर-नगर में भटकती फिरती हूँ। सारे कुंजों में तुम्हें खोज रही हूँ। अंग-अंग में भभूत और गले में मृगछाला डाल ली है। इस प्रकार तेरा यह तन भस्म कर रही हूं। आज भी मुझे राम अविनाशी नहीं मिला। मैं वन-वन में उसको ढूंढती मारी-मारी फिर रही हूँ और उसे टेर-टेर कर नित्य रो रही हूँ। जब मीरा को गिरधर मिला, सुख देने वाले ने सारे दुख मिटा दिए। रोम-रोम व हृदय शांत पड गए हैं और मैं बार-बार जीने-मरने के मायाजाल से मुक्त हो गई हूँ। अब तुम्हारी यह दासी सदा तुम्हारे चरणों तले रहेगी।
हाड हिमालां गरां
सतबादी हरिचन्दा राजा, डोम घर णीरां भरां।
पांच पांडु री राणी द्रुपता, हाड हिमालां गरां।
जाग कियां बलि लेन इन्द्रासन, जांयां पाताल करां
मीरा रे प्रभु गिरधरनागर, बिखरू अभ्रित करां॥
भाग्य का लिखा अटल है, इसे नहीं टाला जा सकता। यह भाग्य के लिखे का ही फल है कि सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र को डोम के घर पानी भरने की चाकरी करनी पडी थी। पांच पांडवों की रानी द्रौपदी को हिमालय पर जाकर अपना शरीर गलाना पडा था। बलि ने इंद्रासन पर अधिकार जमाने के लिए यज्ञ किया था, किंतु भाग्य के लिखे ने उसे पाताल में जा पटका। मीरा के प्रभु तो गिरधरनागर हैं। वही भाग्यविधाता हैं, उन्हीं की इच्छा से विष भी अमृत बन जाता है।
चरण कमल पर वारी
आवत मोरी गलियन में गिरधारी।
मैं तो छुप गई लाज की मारी।
कुसुमल पाग केसरिया जामा, ऊपर फूल हजारी।
मुकुट ऊपर छत्र बिराजे, कुण्डल की छबि न्यारी।
केसरी चीर दरयाई को लेंगो, ऊपर अंगिया भारी।
आवत देखी किसन मुरारी, छिप गई राधा प्यारी।
मोर मुकुट मनोहर सोहै, नथनी की छबि न्यारी।
गल मोतिन की माल बिराजे, चरण कमल बलिहारी।
ऊभी राधा प्यारी अरज करत है, सुणजे किसन मुरारी।
मीरा रे प्रभु गिरधरनागर, चरण कमल पर वारी॥
गिरधारी को अपनी गली में आते देखा तो लाज की मारी मैं छिप गई। उनके सिर पर लाल रंग की पगडी थी, तन पर केसरिया वस्त्र और ऊपर सहस्त्र दलों के पुष्प। मुकुट के ऊपर छत्र विराजमान था और कुण्डलों की छवि न्यारी। राधा ने केसरिया रंग की अंगिया पहन रखी थी। प्यारी राधा ने किशन मुरारी को आते देखा तो छिप गई। उनके माथे पर मोर-मुकुट सज रहा था और नथनी की छवि न्यारी थी। गले में मोतियों की माला विराज रही थी। मैं उनके चरणकमलों पर बलिहारी जाती हूँ। राधा प्यारी खडी विनती करती है कि किशन मुरारी, मेरी बात सुनकर जाओ। मीरा कहती है कि मेरे प्रभु तो गिरधरनागर हैं, उनके चरणकमलों पर वारी-वारी जाती हूँ।
णेणा बाण पडी
आली री म्हारे णेणा बाण पडी।
चित्त चढी म्हारे माधुरी मूरत, हिवडा अणी गढी।
कब री ठाडी पंथ निहारां, अपने भवण खडी।
अटक्यां प्राण सांवरो, प्यारो, जीवण मूर जडी।
मीरा गिरधर हाथ बिकाणी, लोक कह्यां बिगडी॥
मीरा कहती हैं कि सखी री, मेरे नैनों को तो सदैव मनमोहन की मूरत निहारने की आदत पड गई है। मेरे चित्त पर उसकी मधुर मूरत ऐसी चढ गई है कि किसी और की सुध ही नहीं रहती। हृदय में इस मनमोहक मूरत की नोक हमेशा गडी रहती है। फिर इसमें किसी और की स्मृति कैसे समा सकती है। अपने भवन में खडी कब से मैं पथ निहार रही हूँ। मेरे प्राण उसी सांवले, प्यारे मनमोहन में अटके हुए हैं। वही मेरे जीवन का मूल है। मीरा कहती है कि मैं तो गिरधर के हाथों बिक चुकी हूं और लोग कहते फिरते हैं कि मैं बिगड गई हूँ।
बैठी कदम की डारी
आज अनारी ले गयो सारी, बैठी कदम की डारी।
म्हारे गले पड्यो गिरधारी, हे माय, आज अनारी।
मैं जल जमुना भरन गई थी, आ गयो कृश्न मरारी।
ले गयो सारी अनारी म्हारी, जल में ऊभी उधारी।
सखी साइनि मेरी हंसत है, हंसि हंसि दे मोहिं तारी।
सास बुरी अर नणद हठीली, लरि लरि दे मोहिं गारी।
मीरा रे प्रभु गिरधरनागर, चरण कमल की बारी।
कृष्ण प्रेम में बिरहिणी बनी मीरा यहाँ अपनी कल्पना में गोपी बन जाती है और अपनी माँ से कह रही है कि कदंब की डाल पर छिपकर बैठा नटखट नागर आज मेरी साडी ले गया। आज तो नटखट गिरधारी मेरे पीछे पड गया। जब मैं यमुना में जल भरने गई थी, वहां कृष्ण मुरारी पहुँच गया। नटखट मेरी साडी ले गया और मैं जल में निर्वस्त्र खडी रही। मेरी हालत देखकर मेरी सखियां हंस-हंस कर मुझ पर तालियां बजा रही थीं। मेरी सास बुरी और ननद हठीली है, वे लडती-झगडती और मुझे गालियां देती हैं। मीरा के प्रभु गिरधरनागर हैं, मैं उनके चरणकमलों में वारी-वारी जाती हूँ।
भाग हमारा जागा रे
अब कोऊ कछु कहो दिल लागा रे।
जाकी प्रीति लगी लालन से, कंचन मिला सुहागा रे।
हंसा की प्रकृति हंसा जाने, का जाने मर कागा रे।
तन भी लागा, मन भी लागा, ज्यूं बाभण गल धागा रे।
मीरा रे प्रभु गिरधरनागर, भाग हमारा जागा रे॥
कृष्ण के प्रेम में भावविभोर होकर मीरा कहती है कि मैं अपने वश में नहीं, अब कोई कुछ भी कहता रहे, मेरा दिल तो मनमोहन से लगा है। जिसकी प्रीत मनमोहन से लग जाती है उसका जीवन सोने पर सुहागा जैसा होता है। वह कितना आह्लादित होता है, इसका अनुभव सिर्फ वही कर सकता है, कोई अन्य नहीं। हंस की प्रकृति सिर्फ हंस ही जान सकता है, बेचारा कौआ क्या जाने! मैंने तो कृष्ण प्रीति में तन-मन यों लगा दिया है जैसे ब्राह्मण के गले में जनेऊ। मीरा कहती है कि मेरे प्रभु तो गिरधरनागर हैं। उनसे प्रीति करके मेरे भाग्य जाग गए।
अमर बेल बोई
अब तो मेरा राम नाम दूसरा न कोई॥
माता छोडी पिता छोडे छोडे सगा भाई।
साधु संग बैठ बैठ लोक लाज खोई॥
सतं देख दौड आई, जगत देख रोई।
प्रेम आंसु डार डार, अमर बेल बोई॥
मारग में तारग मिले, संत राम दोई।
संत सदा शीश राखूं, राम हृदय होई॥
अंत में से तंत काढयो, पीछे रही सोई।
राणे भेज्या विष का प्याला, पीवत मस्त होई॥
अब तो बात फैल गई, जानै सब कोई।
दास मीरा लाल गिरधर, होनी हो सो होई॥
मीरा के लिये भगवत् प्रेम से बढकर कुछ नहीं था। भगवान् को पाने के लिये मीरा ने सर्वस्व त्याग कर दिया। माँ-बाप, पति, सगे-संबंधी सबको छोडकर वह भगवान् की शरण में आ गई। वह कहती है कि जग में मेरा हरि के सिवा और कोई अपना नहीं है। गुरु की कृपा और संतों के सत्संग से मैंने लोक-लाज त्याग दी है। अब में सांसारिक मायाजाल से मुक्ति पा गई हूँ।
मन नाहीं मानी हार
मैं तो तेरी सरण पडी रे रामां, ज्यूं जाणे ज्यूं तार।
अडसठ तीरथ भ्रमि भ्रमि आयो, मन नाहीं मानी हार॥
या जग में कोई नहीं अपणां, सुनियौ स्त्रवन मुरार।
मीरा दासी राम भरोसे, जम का फंद निवार॥
गिरधारी! लाखों यज्ञ और सभी तीर्थ करने के बाद भी मेरा मन मेरे वश में नहीं है। अब मैं तुम्हारी शरण में आई हूँ। मुझे इस भवसागर से पार करो। इस जगत के सभी बंधन झूठे हैं। यहां कोई भी अपना नहीं है। मुझे तो सिर्फ तुम्हारा ही आसरा है।
दूखन लागे नैन
दरस बिन दूखन लागे नैन।
जब से तुम बिछुडे मोरे प्रभु जी, कबहु न पायो चैन।
शब्द सुनत मेरी छातियां कंपै, मीठे लगे बैन।
एक टकटकी पंथ निहारूं, भई छ-मासी रैन।
विरह विथा कासूं कहूं सजनी, बह गई करवत ऐन।
मीरा रे प्रभु कब रे मिलोगे, दुख मेटन सुख देन॥
हरि दर्शन की प्यासी मीरा अपनी विरह वेदना प्रकट करते हुए कहती है कि आपके वियोग में मुझे एक पल भी चैन नहीं मिलता। एक-एक रात छह-छह माह के समान बीतती है। आपके वियोग में मैं इस तरह तडप रही हूं जैसे मेरे हृदय पर तीक्ष्ण तलवार चल रही है। मीरा प्रभु से जल्दी मिलने की विनती करती है ताकि दु:ख का निवारण हो और सच्चे सुख की प्राप्ति हो।
बांह गहे की लाज
अब सो निभायां सरेगी, बांह गहे की लाज॥
समरथ सरण तुम्हारी साइयां, सरब सुधारण काज॥
भव सागर संसार अपरबल, जा में तुम हो जहाज॥
निरधारां अधार जगत गुरु, तुम बिन होय अकाज॥
जुग-जुग भीर हरी भक्तन की दीनो मोक्ष समाज॥
मीरा सरण गही चरणन की, लाज रखो महाराज॥
हरि का नाम जपते हुए सत्य की नौका ही संसार रूपी सागर से पार करती है। मीरा कहती है, मैं भी ईश्वर के चरणों में हूं जिसके स्मरण मात्र से ही सब कार्य पूरे हो जाते हैं। भक्तों के दुख दूर करने वाले सांवरिए मीरा की भी लाज रखना।
बेडो लगाज्यो पार
मेरो बेडो लगाज्यो पार प्रभु जी मैं अरज करूं छै।
या भव में मैं बहुत दुख पायो, संसा सोग निवार।
अष्ट करम की तलब लगी है, दूर करो दुख भार।
यो संसार सब बह्यो जात है, लख चौरासी री धार।
मीरा रे प्रभु गिरधरनागर, आवागमन निवार॥
जगत् के मिथ्यास्वरूप से भालीभाँति परिचित मीरा आवागमन के चक्र से मुक्त होना चाहती है। वह कहती है कि हे प्रभु जी! मैं विनती करती हूं कि मेरा उद्धार कर दो। मेरे बेडे को उस पार लगा दो। इस संसार से मुझे विरक्ति हो गई है। यहाँ मैं बहुत दुख पा रही हूं। चित्त सदैव शंकाओं व शोकों से घिरा रहता है। इन सबका तुम ही निवारण कर सकते हो। संसार में रही तो बस अष्ट कर्मो की तलब लगी रहेगी और मोह-माया से कभी छुटकारा नहीं मिल सकेगा। मेरे इस दुख के भार को तुम दूर कर सकते हो। यह सारा संसार चौरासी लाख योनियों की धाराओं में बहता चला जा रहा है अर्थात बार-बार विभिन्न योनियों में जन्म लेकर आवागमन के चक्रव्यूह में फंसा हुआ है। हे मीरा के प्रभु गिरधरनागर! मेरा उद्धार करो, ताकि मेरे आवागमन का सिलसिला ही समाप्त हो जाए।
भजणा बिना नर फीका
आली म्हाणो लागां बृन्दावण नीकां।
घर-घर तुलती ठाकर पूजां, दरसण गोविन्द जी कां।
निरमल नीर बह्या जमणां मां, भोजण दूध दहीं कां।
रतण सिंघासण आप बिराज्यां, मुगट धर्या तुलसी कां।
कुंजन-कुंजन फिर्या सांवरा, सबद सुण्या मुरली कां।
मीरा रे प्रभु गिरधरनागर, भजण बिना नर फीकां॥
कृष्ण से अंतरंग प्रेम के कारण मीराबाई का मन वृंदावन में रमा रहता था। वह कहती है कि मेरी सखी, मुझे वृंदावन की शोभा बडी प्यारी लगती है। वहां घर-घर में तुलसी से ठाकुरजी की पूजा होती है और कण-कण में गोविंदजी के दर्शन होते हैं। यमुना में निर्मल जल बहता है और सब दूध-दही का भोजन करते हैं। स्वयं मेरा श्याम रत्‍‌न सिंहासन पर विराजता है और उसके सिर पर तुलसी मुकुट है। वहां मेरा सांवरिया कुंज-कुंज में विचरता है और मुरली का स्वर सुनाई देता है। हे मीरा के प्रभु गिरधरनागर! सच तो यह है कि भजन के बिना नर का जीवन निरर्थक है।
मैं सरण हूं तेरी
हरि बिन कूण गति मेरी।
तुम मेरे प्रतिपाल कहियै, मैं रावरी चेरी।
आदि अंत नित नांव तेरो, हीया में फेरी।
बेरि बेरि पुकारि कहूं, प्रभु आरति है तेरी।
यौ संसार विकार सागर, बीच में घेरी।
नाव फाटी पाल बांधो, बूडत हे बेरी।
बिरहणि पिवकी बाट जोवै, राख्लियौ नेरी।
दासि मीरा राम रटत है, मैं सरण हूं तेरी॥
भगवान् के बिना सृष्टि की कल्पना भी व्यर्थ है। मीरा कहती है कि रि के बिना मेरी अन्य कौन-सी गति है? तुम्हीं मेरे प्रतिपालक कहलाते हो और मैं तुम्हारी दासी। आदि से अंत तक तुम्हारा ही नाम हृदय में बार-बार लेती हूं। मैं तुमसे निरंतर पुकार-पुकार कर कहती हूँ कि हे प्रभु! तुम्हारे दर्शनों की तीव्र लालसा है.. आकर मेरी सुध लो। यह संसार और कुछ नहीं है, केवल दुखों और कष्टों का सागर है और मैं इसके बीच घिरी हुई हूँ। मेरी नाव टूट-फूट गई है। हे प्रभु जल्दी से पाल बांधो, वरना इसके डूबने में देर नहीं है। मैं विरहिणी अपने पिया की बाट जोह रही हूं। कृपया करके मुझे अपने पास ही रख लो। यह मीरा दासी सदैव राम का नाम रटती है। स्वयं को तुम्हारे चरणों में सौंप दिया है, मेरी सुध लो, प्रभु।
थारी सरणां आस्यां री
पग बांध घुंघरयां णाच्यारी।
लोग कह्यां मीरा बाबरी, सासु कह्यां कुलनासी री।
विष रो प्यालो राणा भेज्यां, पीवां मीरा हांसां री।
तण मण वार्यां हरि चरणमां दरसण प्यास्यां री।
मीरा रे प्रभु गिरधरनागर, थारी सरणां आस्यां री॥
मैं पैरों में घुंघरू बांधकर नाच रही हूं। यह देखकर मीरा कहती है कि-लोग कहते हैं कि मीरा बावली हो गई है और सास कहती है कि मैं कुल कलंकिनी हूं। राणा तो इतने क्षुब्ध हुए कि विष का प्याला ही भेज दिया और मीरा ने उसे हंसते-हंसते पी लिया। मैंने अपना तन-मन हरि पर वार दिया है, उसके दर्शन से मुझे अमृत की प्राप्ति होती है। हे मीरा के प्रभु गिरधरनागर! मैं तुम्हारे चरणों में आ पडी हूं। लोगों के जी में जो आए कहते रहें।
कोई न करे प्रीत
रमईया मेरे तोही सूं लागी नेह।
लागी प्रीत जिन तोडै रे बाला, अधिकौ कीजै नेह।
जै हूं ऐसी जानती रे बाला, प्रीत कीयां दुष होय।
नगर ढंढोरो फेरती रे, प्रीत करो करो मत कोय।
षीर न षाजे आरी रे, मूरष न कीजै मिन्त।
षिण ताता षिण सीतला रे, षिण बैरी षिण मिन्त।
प्रीत करै ते बाबरा रे, करि तोडै ते क्रूर।
प्रीत निभावण दल के षभण, ते कोई बिरला सूर।
तम गजगीरी कौं चूंतरौरे, हम बालु की भीत।
अब तो म्यां कैसे बणै रे, पूरब जनम की प्रीत।
एकै थाणो रोपिया रे, इक आंबो इक बूल।
बाकौ रस नीकौ लगै रे, बाकी भागै सूल।
ज्यूं डूगर का बाहला रे, यूं ओछा तणा सनेह।
बहता बेता उतावला रे, वहैजी वे तो लटक बतावे छेह।
आयो सांवण भादवा रे, बोलण लागा मोर।
मीरा कूं हरिजन मिल्या रे, ले गया पवन झकोर॥
रमैया, मेरी प्रीत तुम से ही लगी है। यह जो प्रीत लगी है, इसे तोडना मत बल्कि मुझसे अधिक नेह करना। यदि मैं पहले जानती कि प्रीत करने से दुख होता है तो मैं नगर-नगर में ढिंढोरा पिटवा देती कि कोई प्रीत करने की भूल न करे। खीर को आरी से नहीं खाया जाता। मूर्ख से मित्रता करने की भूल नहीं करनी चाहिए। मूर्ख क्षण में ही ठंडा पड जाता है और क्षण में ही गर्म। वह क्षण में दुश्मन बनता है और क्षण में ही मीत। प्रीत करने वाला पागल होता है। प्रेम निभाता है, ऐसा सूरमा विरला ही होता है। तुम मजबूत चबूतर हो तो मैं बालू की कमजोर भीत (दीवार)। अब तो कुछ नहीं हो सकता। मेरे प्रीतम, यह पूर्वजन्म की प्रीत है। आम व बबूल का पेड आसपास रोपा जाए तो भी उनका स्वभाव नहीं बदलता। आम के फल मीठे होंगे और बबूल के पेड में कांटे ही उगेंगे। जिस प्रकार ऊंचाई से गिरने वाला जल शुरू में तो तीव्रता से बहता है, फिर मंद पड जाता है, उसी प्रकार तना हुआ स्नेह भी ओछा होता है। यह पहले तो उतावलापन दिखाता है, किंतु जल्दी उसका उत्साह खत्म हो जाता है। भादो-सावन का महीना आ गया है, और मोर बोलने लगे हैं। मीरा को तो हरि जन मिल गया, जो मुझे पवन के झोंके की भांति उडाकर ले गया।
म्हारे तो गिरधर गोपाल
म्हारे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई॥
जाके सिर मोर मुगट मेरो पति सोई।
तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई॥
छाँडि दई कुद्दकि कानि कहा करिहै कोई॥
संतन ढिग बैठि बैठि लोकलाज खोई॥
चुनरीके किये टूक ओढ लीन्हीं लोई।
मोती मूँगे उतार बनमाला पोई॥
अंसुवन ज8 सींचि सींचि प्रेम बेलि बोई।
अब तो बेल फैल गई आणँद फल होई॥
भगति देखि राजी हुई जगत देखि रोई।
दासी मीरा लाल गिरधर तारो अब मोही॥
मीराबाई के भजन संग्रह से यह पद उद्धृत है।
परसि हरि के चरण
मन रे परसि हरि के चरण।
सुभग सीतल कँवल कोमल, त्रिविध, ज्वाला हरण।
जिण चरण प्रह्लाद परसे, इंद्र पदवी धरण॥
जिण चरण ध्रुव अटल कीन्हें, राख अपनी सरण।
जिण चरण ब्रह्मांड भेटयो, नखसिखाँ सिरी धरण॥
जिण चरण प्रभु परसि लीने, तरी गोतम-घरण।
जिण चरण काद्दीनाग नाथ्यो, गोप लीला-करण॥
जिण चरण गोबरधन धारयो, गर्व मघवा हरण।
दासि मीरा लाल गिरधर, अगम तारण तरण॥
मीराबाई का यह लोकप्रिय पद है। यह भजन संग्रह से उद्धृत

सूरदास के पद : श्रीकृष्ण बालचरित


हरि पालनैं झुलावै
जसोदा हरि पालनैं झुलावै।
हलरावै दुलरावै मल्हावै जोइ सोइ कछु गावै॥
मेरे लाल को आउ निंदरिया काहें न आनि सुवावै।
तू काहै नहिं बेगहिं आवै तोकौं कान्ह बुलावै॥
कबहुं पलक हरि मूंदि लेत हैं कबहुं अधर फरकावैं।
सोवत जानि मौन ह्वै कै रहि करि करि सैन बतावै॥
इहि अंतर अकुलाइ उठे हरि जसुमति मधुरैं गावै।
जो सुख सूर अमर मुनि दुरलभ सो नंद भामिनि पावै॥
राग घनाक्षरी में बद्ध इस पद में सूरदास जी ने भगवान् बालकृष्ण की शयनावस्था का सुंदर चित्रण किया है। वह कहते हैं कि मैया यशोदा श्रीकृष्ण (भगवान् विष्णु) को पालने में झुला रही हैं। कभी तो वह पालने को हल्का-सा हिला देती हैं, कभी कन्हैया को प्यार करने लगती हैं और कभी मुख चूमने लगती हैं। ऐसा करते हुए वह जो मन में आता है वही गुनगुनाने भी लगती हैं। लेकिन कन्हैया को तब भी नींद नहीं आती है। इसीलिए यशोदा नींद को उलाहना देती हैं कि अरी निंदिया तू आकर मेरे लाल को सुलाती क्यों नहीं? तू शीघ्रता से क्यों नहीं आती? देख, तुझे कान्हा बुलाता है। जब यशोदा निंदिया को उलाहना देती हैं तब श्रीकृष्ण कभी तो पलकें मूंद लेते हैं और कभी होंठों को फडकाते हैं। (यह सामान्य-सी बात है कि जब बालक उनींदा होता है तब उसके मुखमंडल का भाव प्राय: ऐसा ही होता है जैसा कन्हैया के मुखमंडल पर सोते समय जाग्रत हुआ।) जब कन्हैया ने नयन मूंदे तब यशोदा ने समझा कि अब तो कान्हा सो ही गया है। तभी कुछ गोपियां वहां आई। गोपियों को देखकर यशोदा उन्हें संकेत से शांत रहने को कहती हैं। इसी अंतराल में श्रीकृष्ण पुन: कुनमुनाकर जाग गए। तब यशोदा उन्हें सुलाने के उद्देश्य से पुन: मधुर-मधुर लोरियां गाने लगीं। अंत में सूरदास नंद पत्‍‌नी यशोदा के भाग्य की सराहना करते हुए कहते हैं कि सचमुच ही यशोदा बडभागिनी हैं। क्योंकि ऐसा सुख तो देवताओं व ऋषि-मुनियों को भी दुर्लभ है।
मुख दधि लेप किए
सोभित कर नवनीत लिए।
घुटुरुनि चलत रेनु तन मंडित मुख दधि लेप किए॥
चारु कपोल लोल लोचन गोरोचन तिलक दिए।
लट लटकनि मनु मत्त मधुप गन मादक मधुहिं पिए॥
कठुला कंठ वज्र केहरि नख राजत रुचिर हिए।
धन्य सूर एकौ पल इहिं सुख का सत कल्प जिए॥
राग बिलावल पर आधारित इस पद में श्रीकृष्ण की बाल लीला का अद्भुत वर्णन किया है भक्त शिरोमणि सूरदास जी ने। श्रीकृष्ण अभी बहुत छोटे हैं और यशोदा के आंगन में घुटनों के बल ही चल पाते हैं। एक दिन उन्होंने ताजा निकला माखन एक हाथ में लिया और लीला करने लगे। सूरदास कहते हैं कि श्रीकृष्ण के छोटे-से एक हाथ में ताजा माखन शोभायमान है और वह उस माखन को लेकर घुटनों के बल चल रहे हैं। उनके शरीर पर रेनु (मिट्टी का रज) लगी है। मुख पर दही लिपटा है, उनके कपोल (गाल) सुंदर तथा नेत्र चपल हैं। ललाट पर गोरोचन का तिलक लगा है। बालकृष्ण के बाल घुंघराले हैं। जब वह घुटनों के बल माखन लिए हुए चलते हैं तब घुंघराले बालों की लटें उनके कपोल पर झूमने लगती है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है मानो भ्रमर मधुर रस का पान कर मतवाले हो गए हैं। उनके इस सौंदर्य की अभिवृद्धि उनके गले में पडे कठुले (कंठहार) व सिंह नख से और बढ जाती है। सूरदास कहते हैं कि श्रीकृष्ण के इस बालरूप का दर्शन यदि एक पल के लिए भी हो जाता तो जीवन सार्थक हो जाए। अन्यथा सौ कल्पों तक भी यदि जीवन हो तो निरर्थक ही है।
कबहुं बढैगी चोटी
मैया कबहुं बढैगी चोटी।
किती बेर मोहि दूध पियत भइ यह अजहूं है छोटी॥
तू जो कहति बल की बेनी ज्यों ह्वै है लांबी मोटी।
काढत गुहत न्हवावत जैहै नागिन-सी भुई लोटी॥
काचो दूध पियावति पचि पचि देति न माखन रोटी।
सूरदास त्रिभुवन मनमोहन हरि हलधर की जोटी॥
रामकली राग में बद्ध यह पद बहुत सरस है। बाल स्वभाववश प्राय: श्रीकृष्ण दूध पीने में आनाकानी किया करते थे। तब एक दिन माता यशोदा ने प्रलोभन दिया कि कान्हा! तू नित्य कच्चा दूध पिया कर, इससे तेरी चोटी दाऊ (बलराम) जैसी मोटी व लंबी हो जाएगी। मैया के कहने पर कान्हा दूध पीने लगे। अधिक समय बीतने पर एक दिन कन्हैया बोले.. अरी मैया! मेरी यह चोटी कब बढेगी? दूध पीते हुए मुझे कितना समय हो गया। लेकिन अब तक भी यह वैसी ही छोटी है। तू तो कहती थी कि दूध पीने से मेरी यह चोटी दाऊ की चोटी जैसी लंबी व मोटी हो जाएगी। संभवत: इसीलिए तू मुझे नित्य नहलाकर बालों को कंघी से संवारती है, चोटी गूंथती है, जिससे चोटी बढकर नागिन जैसी लंबी हो जाए। कच्चा दूध भी इसीलिए पिलाती है। इस चोटी के ही कारण तू मुझे माखन व रोटी भी नहीं देती। इतना कहकर श्रीकृष्ण रूठ जाते हैं। सूरदास कहते हैं कि तीनों लोकों में श्रीकृष्ण-बलराम की जोडी मन को सुख पहुंचाने वाली है।
दाऊ बहुत खिझायो
मैया मोहिं दाऊ बहुत खिझायो।
मो सों कहत मोल को लीन्हों तू जसुमति कब जायो॥
कहा करौं इहि रिस के मारें खेलन हौं नहिं जात।
पुनि पुनि कहत कौन है माता को है तेरो तात॥
गोरे नंद जसोदा गोरी तू कत स्यामल गात।
चुटकी दै दै ग्वाल नचावत हंसत सबै मुसुकात॥
तू मोहीं को मारन सीखी दाउहिं कबहुं न खीझै।
मोहन मुख रिस की ये बातैं जसुमति सुनि सुनि रीझै॥
सुनहु कान बलभद्र चबाई जनमत ही को धूत।
सूर स्याम मोहिं गोधन की सौं हौं माता तू पूत॥
सूरदास जी की यह रचना राग गौरी पर आधारित है। यह पद भगवान् श्रीकृष्ण की बाल लीला से संबंधित पहलू का सजीव चित्रण है। बलराम श्रीकृष्ण के बडे भाई थे। गौरवर्ण बलराम श्रीकृष्ण के श्याम रंग पर यदा-कदा उन्हें चिढाया करते थे। एक दिन कन्हैया ने मैया से बलराम की शिकायत की। वह कहने लगे कि मैया री, दाऊ मुझे ग्वाल-बालों के सामने बहुत चिढाता है। वह मुझसे कहता है कि यशोदा मैया ने तुझे मोल लिया है। क्या करूं मैया! इसी कारण मैं खेलने भी नहीं जाता। वह मुझसे बार-बार कहता है कि तेरी माता कौन है और तेरे पिता कौन हैं? क्योंकि नंदबाबा तो गोरे हैं और मैया यशोदा भी गौरवर्णा हैं। लेकिन तू सांवले रंग का कैसे है? यदि तू उनका पुत्र होता तो तुझे भी गोरा होना चाहिए। जब दाऊ ऐसा कहता है तो ग्वाल-बाल चुटकी बजाकर मेरा उपहास करते हैं, मुझे नचाते हैं और मुस्कराते हैं। इस पर भी तू मुझे ही मारने को दौडती है। दाऊ को कभी कुछ नहीं कहती। श्रीकृष्ण की रोष भरी बातें सुनकर मैया यशोदा रीझने लगी हैं। फिर कन्हैया को समझाकर कहती हैं कि कन्हैया! वह बलराम तो बचपन से ही चुगलखोर और धूर्त है। सूरदास कहते हैं कि जब श्रीकृष्ण मैया की बातें सुनकर भी नहीं माने तब यशोदा बोलीं कि कन्हैया मैं गउओं की सौगंध खाकर कहती हूँ कि तू मेरा ही पुत्र है और मैं तेरी मैया हूँ।
मैं नहिं माखन खायो
मैया! मैं नहिं माखन खायो।
ख्याल परै ये सखा सबै मिलि मेरैं मुख लपटायो॥
देखि तुही छींके पर भाजन ऊंचे धरि लटकायो।
हौं जु कहत नान्हें कर अपने मैं कैसें करि पायो॥
मुख दधि पोंछि बुद्धि इक कीन्हीं दोना पीठि दुरायो।
डारि सांटि मुसुकाइ जशोदा स्यामहिं कंठ लगायो॥
बाल बिनोद मोद मन मोह्यो भक्ति प्राप दिखायो।
सूरदास जसुमति को यह सुख सिव बिरंचि नहिं पायो॥
राग रामकली में बद्ध यह सूरदास का अत्यंत प्रचलित पद है। श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं में माखन चोरी की लीला सुप्रसिद्ध है। वैसे तो कन्हैया ग्वालिनों के घरों में जा-जाकर माखन चुराकर खाया करते थे। लेकिन आज उन्होंने अपने ही घर में माखन चोरी की और यशोदा ने उन्हें देख भी लिया। इस पद में सूरदास ने श्रीकृष्ण के वाक्चातुर्य का जिस प्रकार वर्णन किया है वैसा अन्यत्र नहीं मिलता।
जब यशोदा ने देख लिया कि कान्हा ने माखन खाया है तो पूछ ही लिया कि क्यों रे कान्हा! तूने माखन खाया है क्या? तब श्रीकृष्ण अपना पक्ष किस तरह मैया के समक्ष प्रस्तुत करते हैं, यही इस पद की विशिष्टता है। कन्हैया बोले.. मैया! मैंने माखन नहीं खाया है। मुझे तो ऐसा लगता है कि इन ग्वाल-बालों ने ही बलात् मेरे मुख पर माखन लगा दिया है। फिर बोले कि मैया तू ही सोच, तूने यह छींका किना ऊंचा लटका रखा है और मेरे हाथ कितने छोटे-छोटे हैं। इन छोटे हाथों से मैं कैसे छींके को उतार सकता हूँ। कन्हैया ने मुख से लिपटा माखन पोंछा और एक दोना जिसमें माखन बचा रह गया था उसे पीछे छिपा लिया। कन्हैया की इस चतुराई को देखकर यशोदा मन ही मन मुस्कराने लगीं और छडी फेंककर कन्हैया को गले से लगा लिया। सूरदास कहते हैं कि यशोदा को जिस सुख की प्राप्ति हुई वह सुख शिव व ब्रह्मा को भी दुर्लभ है। श्रीकृष्ण (भगवान् विष्णु) ने बाल लीलाओं के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि भक्ति का प्रभाव कितना महत्त्‍‌वपूर्ण है।
हरष आनंद बढावत
हरि अपनैं आंगन कछु गावत।
तनक तनक चरनन सों नाच मन हीं मनहिं रिझावत॥
बांह उठाइ कारी धौरी गैयनि टेरि बुलावत।
कबहुंक बाबा नंद पुकारत कबहुंक घर में आवत॥
माखन तनक आपनैं कर लै तनक बदन में नावत।
कबहुं चितै प्रतिबिंब खंभ मैं लोनी लिए खवावत॥
दुरि देखति जसुमति यह लीला हरष आनंद बढावत।
सूर स्याम के बाल चरित नित नितही देखत भावत॥
राग रामकली में आबद्ध इस पद में सूरदास ने कृष्ण की बालसुलभ चेष्टा का वर्णन किया है। श्रीकृष्ण अपने ही घर के आंगन में जो मन में आता है गाते हैं। वह छोटे-छोटे पैरों से थिरकते हैं तथा मन ही मन स्वयं को रिझाते भी हैं। कभी वह भुजाओं को उठाकर काली-श्वेत गायों को बुलाते हैं, तो कभी नंदबाबा को पुकारते हैं और कभी घर में आ जाते हैं। अपने हाथों में थोडा-सा माखन लेकर कभी अपने ही शरीर पर लगाने लगते हैं, तो कभी खंभे में अपना ही प्रतिबिंब देखकर उसे माखन खिलाने लगते हैं। श्रीकृष्ण की इन सभी लीलाओं को माता यशोदा छुप-छुपकर देखती हैं और मन ही मन प्रसन्न होती हैं। सूरदास कहते हैं कि इस प्रकार यशोदा श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं को देखकर नित्य ही हर्षाती हैं।
भई सहज मत भोरी
जो तुम सुनहु जसोदा गोरी।
नंदनंदन मेरे मंदिर में आजु करन गए चोरी॥
हौं भइ जाइ अचानक ठाढी कह्यो भवन में कोरी।
रहे छपाइ सकुचि रंचक ह्वै भई सहज मति भोरी॥
मोहि भयो माखन पछितावो रीती देखि कमोरी।
जब गहि बांह कुलाहल कीनी तब गहि चरन निहोरी॥
लागे लेन नैन जल भरि भरि तब मैं कानि न तोरी।
सूरदास प्रभु देत दिनहिं दिन ऐसियै लरिक सलोरी॥
सूरदास जी का यह पद राग गौरी पर आधारित है। भगवान् की बाल लीला का रोचक वर्णन है। एक ग्वालिन यशोदा के पास कन्हैया की शिकायत लेकर आई। वह बोली कि हे नंदभामिनी यशोदा! सुनो तो, नंदनंदन कन्हैया आज मेरे घर में चोरी करने गए। पीछे से मैं भी अपने भवन के निकट ही छुपकर खडी हो गई। मैंने अपने शरीर को सिकोड लिया और भोलेपन से उन्हें देखती रही। जब मैंने देखा कि माखन भरी वह मटकी बिल्कुल ही खाली हो गई है तो मुझे बहुत पछतावा हुआ। जब मैंने आगे बढकर कन्हैया की बांह पकड ली और शोर मचाने लगी, तब कन्हैया मेरे चरणों को पकडकर मेरी मनुहार करने लगे। इतना ही नहीं उनके नयनों में अश्रु भी भर आए। ऐसे में मुझे दया आ गई और मैंने उन्हें छोड दिया। सूरदास कहते हैं कि इस प्रकार नित्य ही विभिन्न लीलाएं कर कन्हैया ने ग्वालिनों को सुख पहुँचाया।
अरु हलधर सों भैया
कहन लागे मोहन मैया मैया।
नंद महर सों बाबा बाबा अरु हलधर सों भैया॥
ऊंच चढि चढि कहति जशोदा लै लै नाम कन्हैया।
दूरि खेलन जनि जाहु लाला रे! मारैगी काहू की गैया॥
गोपी ग्वाल करत कौतूहल घर घर बजति बधैया।
सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस कों चरननि की बलि जैया॥
सूरदास जी का यह पद राग देव गंधार में आबद्ध है। भगवान् बालकृष्ण मैया, बाबा और भैया कहने लगे हैं। सूरदास कहते हैं कि अब श्रीकृष्ण मुख से यशोदा को मैया-मैया नंदबाबा को बाबा-बाबा व बलराम को भैया कहकर पुकारने लगे हैं। इना ही नहीं अब वह नटखट भी हो गए हैं, तभी तो यशोदा ऊंची होकर अर्थात् कन्हैया जब दूर चले जाते हैं तब उचक-उचककर कन्हैया को नाम लेकर पुकारती हैं और कहती हैं कि लल्ला गाय तुझे मारेगी। सूरदास कहते हैं कि गोपियों व ग्वालों को श्रीकृष्ण की लीलाएं देखकर अचरज होता है। श्रीकृष्ण अभी छोटे ही हैं और लीलाएं भी उनकी अनोखी हैं। इन लीलाओं को देखकर ही सब लोग बधाइयां दे रहे हैं। सूरदास कहते हैं कि हे प्रभु! आपके इस रूप के चरणों की मैं बलिहारी जाता हूँ।
कबहुं बोलत तात
खीझत जात माखन खात।
अरुन लोचन भौंह टेढी बार बार जंभात॥
कबहुं रुनझुन चलत घुटुरुनि धूरि धूसर गात।
कबहुं झुकि कै अलक खैंच नैन जल भरि जात॥
कबहुं तोतर बोल बोलत कबहुं बोलत तात।
सूर हरि की निरखि सोभा निमिष तजत न मात॥
यह पद राग रामकली में बद्ध है। एक बार श्रीकृष्ण माखन खाते-खाते रूठ गए और रूठे भी ऐसे कि रोते-रोते नेत्र लाल हो गए। भौंहें वक्र हो गई और बार-बार जंभाई लेने लगे। कभी वह घुटनों के बल चलते थे जिससे उनके पैरों में पडी पैंजनिया में से रुनझुन स्वर निकलते थे। घुटनों के बल चलकर ही उन्होंने सारे शरीर को धूल-धूसरित कर लिया। कभी श्रीकृष्ण अपने ही बालों को खींचते और नैनों में आंसू भर लाते। कभी तोतली बोली बोलते तो कभी तात ही बोलते। सूरदास कहते हैं कि श्रीकृष्ण की ऐसी शोभा को देखकर यशोदा उन्हें एक पल भी छोडने को न हुई अर्थात् श्रीकृष्ण की इन छोटी-छोटी लीलाओं में उन्हें अद्भुत रस आने लगा।
चोरि माखन खात
चली ब्रज घर घरनि यह बात।
नंद सुत संग सखा लीन्हें चोरि माखन खात॥
कोउ कहति मेरे भवन भीतर अबहिं पैठे धाइ।
कोउ कहति मोहिं देखि द्वारें उतहिं गए पराइ॥
कोउ कहति किहि भांति हरि कों देखौं अपने धाम।
हेरि माखन देउं आछो खाइ जितनो स्याम॥
कोउ कहति मैं देखि पाऊं भरि धरौं अंकवारि।
कोउ कहति मैं बांधि राखों को सकैं निरवारि॥
सूर प्रभु के मिलन कारन करति बुद्धि विचार।
जोरि कर बिधि को मनावतिं पुरुष नंदकुमार॥
भगवान् श्रीकृष्ण की बाललीला से संबंधित सूरदास जी का यह पद राग कान्हडा पर आधारित है। ब्रज के घर-घर में इस बात की चर्चा हो गई कि नंदपुत्र श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ चोरी करके माखन खाते हैं। एक स्थान पर कुछ ग्वालिनें ऐसी ही चर्चा कर रही थीं। उनमें से कोई ग्वालिन बोली कि अभी कुछ देर पूर्व तो वह मेरे ही घर में आए थे। कोई बोली कि मुझे दरवाजे पर खडी देखकर वह भाग गए। एक ग्वालिन बोली कि किस प्रकार कन्हैया को अपने घर में देखूं। मैं तो उन्हें इतना अधिक और उत्तम माखन दूं जितना वह खा सकें। लेकिन किसी भांति वह मेरे घर तो आएं। तभी दूसरी ग्वालिन बोली कि यदि कन्हैया मुझे दिखाई पड जाएं तो मैं गोद में भर लूं। एक अन्य ग्वालिन बोली कि यदि मुझे वह मिल जाएं तो मैं उन्हें ऐसा बांधकर रखूं कि कोई छुडा ही न सके। सूरदास कहते हैं कि इस प्रकार ग्वालिनें प्रभु मिलन की जुगत बिठा रही थीं। कुछ ग्वालिनें यह भी विचार कर रही थीं कि यदि नंदपुत्र उन्हें मिल जाएं तो वह हाथ जोडकर उन्हें मना लें और पतिरूप में स्वीकार कर लें।
गाइ चरावन जैहौं
आजु मैं गाइ चरावन जैहौं।
बृन्दावन के भांति भांति फल अपने कर मैं खेहौं॥
ऐसी बात कहौ जनि बारे देखौ अपनी भांति।
तनक तनक पग चलिहौ कैसें आवत ह्वै है राति॥
प्रात जात गैया लै चारन घर आवत हैं सांझ।
तुम्हारे कमल बदन कुम्हिलैहे रेंगत घामहि मांझ॥
तेरी सौं मोहि घाम न लागत भूख नहीं कछु नेक।
सूरदास प्रभु कह्यो न मानत पर्यो अपनी टेक॥
यह पद राग रामकली में बद्ध है। एक बार बालकृष्ण ने हठ पकड लिया कि मैया आज तो मैं गौएं चराने जाऊंगा। साथ ही वृन्दावन के वन में उगने वाले नाना भांति के फलों को भी अपने हाथों से खाऊंगा। इस पर यशोदा ने कृष्ण को समझाया कि अभी तो तू बहुत छोटा है। इन छोटे-छोटे पैरों से तू कैसे चल पाएगा.. और फिर लौटते समय रात्रि भी हो जाती है। तुझसे अधिक आयु के लोग गायों को चराने के लिए प्रात: घर से निकलते हैं और संध्या होने पर लौटते हैं। सारे दिन धूप में वन-वन भटकना पडता है। फिर तेरा वदन पुष्प के समान कोमल है, यह धूप को कैसे सहन कर पाएगा।
यशोदा के समझाने का कृष्ण पर कोई प्रभाव नहीं हुआ, बल्कि उलटकर बोले, मैया! मैं तेरी सौगंध खाकर कहता हूं कि मुझे धूप नहीं लगती और न ही भूख सताती है। सूरदास कहते हैं कि परब्रह्म स्वरूप श्रीकृष्ण ने यशोदा की एक नहीं मानी और अपनी ही बात पर अटल रहे।
धेनु चराए आवत
आजु हरि धेनु चराए आवत।
मोर मुकुट बनमाल बिराज पीतांबर फहरावत॥
जिहिं जिहिं भांति ग्वाल सब बोलत सुनि स्त्रवनन मन राखत।
आपुन टेर लेत ताही सुर हरषत पुनि पुनि भाषत॥
देखत नंद जसोदा रोहिनि अरु देखत ब्रज लोग।
सूर स्याम गाइन संग आए मैया लीन्हे रोग॥
भगवान् बालकृष्ण जब पहले दिन गाय चराने वन में जाते है, उसका अप्रतिम वर्णन किया है सूरदास जी ने अपने इस पद के माध्यम से। यह पद राग गौरी में बद्ध है। आज प्रथम दिवस श्रीहरि गौओं को चराकर आए हैं। उनके शीश पर मयूरपुच्छ का मुकुट शोभित है, तन पर पीतांबरी धारण किए हैं। गायों को चराते समय जिस प्रकार से अन्य ग्वाल-बाल शब्दोच्चारण करते हैं उनको श्रवण कर श्रीहरि ने हृदयंगम कर लिया है। वन में स्वयं भी वैसे ही शब्दों का उच्चारण कर प्रतिध्वनि सुनकर हर्षित होते हैं। नंद, यशोदा, रोहिणी व ब्रज के अन्य लोग यह सब दूर ही से देख रहे हैं। सूरदास कहते हैं कि जब श्यामसुंदर गौओं को चराकर आए तो यशोदा ने उनकी बलैयां लीं।
मुखहिं बजावत बेनु
धनि यह बृंदावन की रेनु।
नंदकिसोर चरावत गैयां मुखहिं बजावत बेनु॥
मनमोहन को ध्यान धरै जिय अति सुख पावत चैन।
चलत कहां मन बस पुरातन जहां कछु लेन न देनु॥
इहां रहहु जहं जूठन पावहु ब्रज बासिनि के ऐनु।
सूरदास ह्यां की सरवरि नहिं कल्पबृच्छ सुरधेनु॥
राग सारंग पर आधारित इस पद में सूरदास कहते हैं कि वह ब्रजरज धन्य है जहां नंदपुत्र श्रीकृष्ण गायों को चराते हैं तथा अधरों पर रखकर बांसुरी बजाते हैं। उस भूमि पर श्यामसुंदर का ध्यान (स्मरण) करने से मन को परम शांति मिलती है। सूरदास मन को प्रबोधित करते हुए कहते हैं कि अरे मन! तू काहे इधर-उधर भटकता है। ब्रज में ही रह, जहां व्यावहारिकता से परे रहकर सुख प्राप्ति होती है। यहां न किसी से लेना, न किसी को देना। सब ध्यानमग्न हो रहे हैं। ब्रज में रहते हुए ब्रजवासियों के जूठे बासनों (बरतनों) से जो कुछ प्राप्त हो उसी को ग्रहण करने से ब्रह्मत्व की प्राप्ति होती है। सूरदास कहते हैं कि ब्रजभूमि की समानता कामधेनु भी नहीं कर सकती। इस पद में सूरदास ने ब्रज भूमि का महत्त्‍‌व प्रतिपादित किया है।
कौन तू गोरी
बूझत स्याम कौन तू गोरी।
कहां रहति काकी है बेटी देखी नहीं कहूं ब्रज खोरी॥
काहे कों हम ब्रजतन आवतिं खेलति रहहिं आपनी पौरी।
सुनत रहति स्त्रवननि नंद ढोटा करत फिरत माखन दधि चोरी॥
तुम्हरो कहा चोरि हम लैहैं खेलन चलौ संग मिलि जोरी।
सूरदास प्रभु रसिक सिरोमनि बातनि भुरइ राधिका भोरी॥
सूरसागर से उद्धृत यह पद राग तोडी में बद्ध है। राधा के प्रथम मिलन का इस पद में वर्णन किया है सूरदास जी ने। श्रीकृष्ण ने पूछा कि हे गोरी! तुम कौन हो? कहां रहती हो? किसकी पुत्री हो? हमने पहले कभी ब्रज की इन गलियों में तुम्हें नहीं देखा। तुम हमारे इस ब्रज में क्यों चली आई? अपने ही घर के आंगन में खेलती रहतीं। इतना सुनकर राधा बोली, मैं सुना करती थी कि नंदजी का लडका माखन की चोरी करता फिरता है। तब कृष्ण बोले, लेकिन तुम्हारा हम क्या चुरा लेंगे। अच्छा, हम मिलजुलकर खेलते हैं। सूरदास कहते हैं कि इस प्रकार रसिक कृष्ण ने बातों ही बातों में भोली-भाली राधा को भरमा दिया।
मिटि गई अंतरबाधा
खेलौ जाइ स्याम संग राधा।
यह सुनि कुंवरि हरष मन कीन्हों मिटि गई अंतरबाधा॥
जननी निरखि चकित रहि ठाढी दंपति रूप अगाधा॥
देखति भाव दुहुंनि को सोई जो चित करि अवराधा॥
संग खेलत दोउ झगरन लागे सोभा बढी अगाधा॥
मनहुं तडित घन इंदु तरनि ह्वै बाल करत रस साधा॥
निरखत बिधि भ्रमि भूलि पर्यौ तब मन मन करत समाधा॥
सूरदास प्रभु और रच्यो बिधि सोच भयो तन दाधा॥
रास रासेश्वरी राधा और रसिक शिरोमणि श्रीकृष्ण एक ही अंश से अवतरित हुये थे। अपनी रास लीलाओं से ब्रज की भूमि को उन्होंने गौरवान्वित किया। वृषभानु व कीर्ति (राधा के माँ-बाप) ने यह निश्चय किया कि राधा श्याम के संग खेलने जा सकती है। इस बात का राधा को पता लगा तब वह अति प्रसन्न हुई और उसके मन में जो बाधा थी वह समाप्त हो गई। (माता-पिता की स्वीकृति मिलने पर अब कोई रोक-टोक रही ही नहीं, इसी का लाभ उठाते हुए राधा श्यामसुंदर के संग खेलने लगी।) जब राधा-कृष्ण खेल रहे थे तब राधा की माता दूर खडी उन दोनों की जोडी को, जो अति सुंदर थी, देख रही थीं। दोनों की चेष्टाओं को देखकर कीर्तिदेवी मन ही मन प्रसन्न हो रही थीं। तभी राधा और कृष्ण खेलते-खेलते झगड पडे। उनका झगडना भी सौंदर्य की पराकाष्ठा ही थी। ऐसा लगता था मानो दामिनी व मेघ और चंद्र व सूर्य बालरूप में आनंद रस की अभिवृद्धि कर रहे हों। यह देखकर ब्रह्म भी भ्रमित हो गए और मन ही मन विचार करने लगे। सूरदास कहते हैं कि ब्रह्म को यह भ्रम हो गया कि कहीं जगत्पति ने अन्य सृष्टि तो नहीं रच डाली। ऐसा सोचकर उनमें ईष्र्याभाव उत्पन्न हो गया।






सूरदास के पद: भ्रमरगीत


निसि दिन बरषत नैन हमारे
निसि दिन बरषत नैन हमारे।
सदा रहति बरषा रितु हम पर जब तें स्याम सिधारे॥
दृग अंजन न रहत निसि बासर कर कपोल भए कारे।
कंचुकि पट सूखत नहिं कबहूं उर बिच बहत पनारे॥
आंसू सलिल भई सब काया पल न जात रिस टारे।
सूरदास प्रभु यहै परेखो गोकुल काहें बिसारे॥
यह पद विरह वेदना की अद्भुत कृति है। राग मल्हार में आबद्ध इस पद में सूरदास जी ने कृष्ण से विलग हुई गोपियों की विरह वेदना का सजीव चित्रण किया है। अक्रूरजी जब बलराम के साथ श्रीकृष्ण को भी मथुरा ले गए तब गोपियां विरहग्रस्त हो गई। सूरदास के पदों में गोपियों का विरह भाव स्वष्ट झलकता है। इस प्रसिद्ध पद में कृष्ण के वियोग में गोपियों की क्या दशा हुई, उसी का वर्णन सूरदास ने किया है। कृष्ण को संबोधन देते हुए गोपियां कहती हैं कि हे कन्हाई! जब से तुम ब्रज को छोडकर मथुरा गए हो, तभी से हमारे नयन नित्य ही वर्षा के जल की भांति बरस रहे हैं अर्थात् तुम्हारे वियोग में हम दिन-रात रोती रहती हैं। रोते रहने के कारण इन नेत्रों में काजल भी नहीं रह पाता अर्थात् वह भी आंसुओं के साथ बहकर हमारे कपोलों (गालों) को भी श्यामवर्णी कर देता है। हे श्याम! हमारी कंचुकि (चोली या अंगिया) आंसुओं से इतनी अधिक भीग जाती है कि सूखने का कभी नाम ही नहीं लेती। फलत: वक्ष के मध्य से परनाला-सा बहता रहता है। इन निरंतर बहने वाले आंसुओं के कारण हमारी यह देह जल का स्त्रोत बन गई है, जिसमें से जल सदैव रिसता रहता है। सूरदास के शब्दों में गोपियां कृष्ण से कहती हैं कि हे श्याम! तुम यह तो बताओ कि तुमने गोकुल को क्यों भुला दिया है।
बिथा बिरह जुर भारी
जब ते बिछुरे कुंज बिहारी।
नींद न परै घटै नहिं रजनी बिथा बिरह जुर भारी॥
सरद रैनि नलिनी दल सीतल जगमग रही उजियारी।
रवि किरनन ते लागति ताती इहि सीतल ससि जारी॥
स्त्रवननि सबद सुहाइ न सखि री पिक चातक द्रुम डारी।
उर तें सखी दूर करि हारहिं कंकन धरहिं उतारी॥
सूर स्याम बिनु दुख लागत है कुसुम सेज करि न्यारी।
बिलखि बदन बृषभानु नंदिनी करि बहु जतन जु हारी॥
राग केदार में आबद्ध इस पद के माध्यम से सूरदास जी ने वृषभानुनंदिनी राधा की विरह वेदना का वर्णन किया है। गोकुल से कृष्ण के चले जाने पर राधा बहुत व्याकुल हो जाती हैं। जब से कृष्ण मथुरा गए हैं तभी से राधा को नींद नहीं आती। रात जैसे समाप्त होने का नाम ही नहीं लेती। इतना ही नहीं विरह के कारण ज्वर पीडा भी हो गई है। शरद् ऋतु की रात्रि कृष्ण के सान्निध्य काल में जगमगाती अच्छी लगती थी और कमलिनी के पुष्प भी अच्छे लगते थे, वही सब वियोग काल में सूर्य किरणों के समान दग्ध करने वाली प्रतीत होती हैं। यही स्थिति चंद्रमा की है, वह भी अग्नि समान प्रतीत हो रहा है। राधा अपनी सखी से कहती है कि अरी सखी! अब तो वृक्षों की शाखा पर बैठकर कुहकने वाली कोयल व चातक की स्वर लहरी भी नहीं सुहाती। राधा और कहती है कि सखी मैंने तो गले के हार भी उतारकर अलग रख दिया है क्योंकि प्रियतम के बिना यह सब अच्छा नहीं लगता। सूरदास कहते हैं कि राधा को पुष्पों से सुसज्जित शय्या भी श्याम के बिना काटने को दौडती है। इतने पर भी राधा अपने शरीर को अथक प्रयास कर जैसे-तैसे संभाले हुए हैं।
मन न भए दस-बीस
ऊधौ मन न भए दस-बीस।
एक हुतो सो गयो स्याम संग को अवराधै ईस॥
इंद्री सिथिल भई केसव बिनु ज्यों देही बिनु सीस।
आसा लागि रहत तन स्वासा जीवहिं कोटि बरीस॥
तुम तौ सखा स्याम सुंदर के सकल जोग के ईस।
सूर हमारैं नंदनंदन बिनु और नहीं जगदीस॥
कृष्ण के अगाध प्रेम में डूबी विरहाकुल गोपियों की हालत का सांगोपांग वर्णन किया है सूरदास जी ने इस पद के माध्यम से। राग सारंग में आबद्ध यह पद सूरदास की कल्पनाशीलता की अद्भुत उडान है। भगवान् कृष्ण जब गोकुल से मथुरा चले गए तो यहाँ उनके वियोग में राधा समेत सभी गोपियां अत्यन्त व्याकुल हो गयीं। कृष्ण को जब यह पता चला तो वह अपने सखा उद्धव जी को गोपियों को समझाने के लिये गोकुल भेजा। उद्धव जी को अपने ज्ञान पर बहुत भरोसा था, परंतु ब्रजभूमि में गोपियों की वेदना देखकर वह भी व्यथित हो गये। गोपियां बोलीं कि हे उद्धव! यदि हम तुम्हारी बात मान भी लें तो यह संभव कैसे होगा, क्योंकि मन कोई दस-बीस तो हैं नहीं, एक ही है। वह मन भी हमारे श्यामसुंदर अपने साथ ले गए हैं। हमारी सभी शारीरिक इंद्रियां भी केशव के बिना शिथिल हो गई हैं, वैसे ही जेसे शीशविहीन देह होती है। इस शरीर में जो श्वास चल रहे हैं वह केवल कृष्ण से मिलने की आशा में ही हैं। इस प्रकार हम कृष्ण मिलन की आस में करोडों वर्षो तक जी सकती हैं। हे उद्धव! आप तो हमारे श्यामसुंदर के सखा हैं और योग विद्या के सर्वज्ञ भी। सूरदास के शब्दों में गोपियों ने उद्धव को आभास करा दिया कि श्रीकृष्ण ही उनके सर्वस्व हैं। उनके बिना और किसी को वे हृदय में धारण नहीं कर सकतीं।
स्याम हमारे चोर
मधुकर स्याम हमारे चोर।
मन हरि लियो तनक चितवनि में चपल नैन की कोर॥
पकरे हुते हृदय उर अंतर प्रेम प्रीति के जोर।
गए छंडाइ तोरि के बंधन दै गए हंसनि अकोर॥
चौंक परीं जानत निसि बीती दूत मिल्यो इक भौंर।
सूरदास प्रभु सरबस लूट्यो नागर नवलकिसोर॥
यह राग सारंग पर आधारित पद है। गोपियां उद्धव से बोलीं, हमारे चित्त को चुराने वाले हमारे श्यामसुंदर ही हैं। उन्होंने टेढी दृष्टि से हमारे चित्त को चुरा लिया है। हमने अपने हृदय में उन्हें भलीभांति जकडकर रखा था। लेकिन उन्होंने तनिक मुस्कान बिखेरकर सारे बंधन तोड डाले और स्वयं को मुक्त करा लिया। इस प्रकार श्यामसुंदर हमारे हृदय से निकल गए, तब हम गोपियां चौंककर जाग गई और रात्रि का सारा समय इन आंखों में ही काट डाला अर्थात रातभर जागती रहीं। जब सवेरा हुआ तो आपके (उद्धव) रूप में एक संदेशवाहक से हमारी भेंट हुई। सूरदास कहते हैं कि गोपियों ने उद्धव को स्पष्ट कर दिया कि कृष्ण ने हमारा सर्वस्व छीन लिया।
हरि दर्शन की प्यासी
अंखिया हरि दरसन की प्यासी।
देख्यो चाहतिं कमलनैन कों निसि दिन रहतिं उदासी॥
आए ऊधौ फिरि गए आंगन डारि गए गर फांसी।
केसरि तिलक मोतिनि की माला बृंदावन के बासी॥
काहू के मन की कोउ जानति लोगनि के मन हांसी।
सूरदास प्रभु तुम्हारे दरस को करबत लैहौं कासी॥
श्रीकृष्ण के विरह में व्याकुल गोपियों की मनोदशा का अद्भुत चित्रण है इस पद में। राग घनाक्षरी पर आधारित सूरदास जी का यह पद भगवान् से मिलने के लिये भक्त की आतुरता दर्शाता है। गोपियां श्रीकृष्ण के विरह में व्याकुल होकर कहती हैं कि हे हरि! हमारी आंखें तुम्हारे दर्शनों को प्यासी हैं। हे कमल नयन! ये आखें आप ही के दर्शनों की इच्छुक हैं, आपके बिना यह दिन-रात उदास रहती हैं। इस पर भी उद्धव यहां आकर हमें ब्रह्म ज्ञान का उपदेश ग्रहण करने की बात कहकर दुविधा में डाल गए हैं। हे वृंदावन वासी, केसर का तिलक लगाने वाले व मोतियों की माला धारण करने वाले श्रीकृष्ण! किसीके मन की कौन जाने! लोग तो हंसी उडाना ही जानते हैं। सूरदास कहते हैं कि गोपियां श्रीकृष्ण के दर्शन करके ही स्वयं को धन्य करना चाहती हैं। ठीक वैसे ही जैसे काशी, प्रयाग आदि स्थानों में प्राण देने पर लोग समझते हैं कि उनकी मुक्ति हो गई। गोपियां भी कृष्ण दर्शनों में ही स्वयं को मुक्त समझती हैं।
मन माने की बात
ऊधौ मन माने की बात।
दाख छुहारा छांडि अमृत फल विषकीरा विष खात॥
ज्यौं चकोर को देइ कपूर कोउ तजि अंगार अघात।
मधुप करत घर कोरि काठ मैं बंधत कमल के पात॥
ज्यौं पतंग हित जानि आपनौ दीपक सौं लपटात।
सूरदास जाकौ मन जासौं सोई ताहि सुहात॥
राग घनाक्षरी पर आधारित सूरदास जी का यह पद बहुत लोकप्रिय है। इस पद का भावार्थ है कि मन पर नियंत्रण मुश्किल है। यह जिस पर भा जाए वही अच्छा लगने लगता है। गोपियां कहती हैं कि हे उद्धव! यह तो मन के मानने की बात है। किसी को कुछ अच्छा लगता है तो किसी को कुछ। अब सर्प को ही लो.. उसे दाख-छुआरा व अमृत (रस से परिपूर्ण) फल अच्छे नहीं लगते। इसीलिए वह विष का सेवन करता है। इसी तरह यदि चकोर को कपूर दिया जाए तो वह उसका परित्याग कर अंगार को ही ग्रहण करता है। भ्रमर काठ को विदीर्ण कर उसमें अपना घर बना लेता है लेकिन स्वयं कमल दल में बंद हो जाता है। पतंगा दीपक को प्राणपण से चाहने के कारण ही उस पर अपने प्राणों को न्योछावर कर देता है। सूरदास कहते हैं कि जिसको जो रुचता है वह उसी को पाता है।
सदा बसै उर माहीं
ज्ञान बिना कहुं वै सुख नाहीं।
घट घट ब्यापक दारु अगिनि ज्यों सदा बसै उर माहीं॥
निरगुन छांडि सगुन को दौरति सुधौं कहौं किहिं पाहीं।
तत्व भजौ जो निकट न छूटै ज्यों तनु ते परछाहीं॥
तिहि तें कहौ कौन सुख पायो हिहिं अब लौं अवगाही।
सूरदास ऐसें करि लागी ज्यों कृषि कीन्हें पाही॥
सूरदास जी का यह पद राग घनाक्षरी में आबद्ध है। उद्धव गोपियों को ज्ञान मार्ग से भक्ति का उपदेश दे रहे हैं तथा निर्गुण एवं सगुण में भेद बता रहे हैं। लेकिन श्रीकृष्ण का साक्षात् दर्शन कर चुकी गोपियाँ भला उद्धव से कैसे सहमत होतीं? उद्धव गोपियों से कहते हैं, ज्ञान के बिना कहीं भी सुख नहीं है। पूर्णब्रह्म परमात्मा सबके घट-घट में वैसे ही व्याप्त हैं जैसे लकडी में अग्नि व्याप्त रहती है अर्थात् लकडी को जब तक जलाया न जाए तब तक उसमें से अग्नि नहीं निकलती। वैसे ही जब तक योग साधन नहीं किया जाता तब तक घट-घट में व्याप्त पूर्णब्रह्म (आत्म तत्त्‍‌व) का ज्ञान नहीं होता। तुम निर्गुण को छोडकर सगुण की ओर दौडती हो। निर्गुण के बिना सगुण की प्राप्ति कैसे होगी? तुम उस परम तत्त्‍‌व का स्मरण करो जो शरीर की परछाई की भांति है और कभी भी विलग होने वाला नहीं है। गोपियां निर्गुण का विरोध करती हुई कहती हैं कि अब तक तो हमने सगुण का ध्यान कर बहुत सुख पाया लेकिन निर्गुण से हमें क्या सुख मिलेगा-जिसका न आकार है, न स्वरूप-न हम जिसे जानती हैं। सूरदास कहते हैं कि गोपियों ने निर्गुण साधना की उपमा मेड पर खेती करने के समान दी है अर्थात् गोपियों ने अनुसार निर्गुण साधना वैसी ही है जैसे मेड पर खेती करना। उनकी दृष्टि में निर्गुण साधना या भक्ति व्यर्थ की बात है।
मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं
ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं।
हंस सुता की सुंदर कगरी अरु कुंजनि की छांहीं॥
वै सुरभी वै बच्छ दोहनी खरिक दुहावन जाहीं।
ग्वालबाल मिलि करत कुलाहल नाचत गहि गहि बाहीं॥
यह मथुरा कंचन की नगरी मनि मुक्ता हल जाहीं।
जबहिं सुरति आवति बा सुख की जिय उमगत तन नाहीं॥
अनगन भांति करी बहु लीला जसुदा नंद निबाहीं।
सूरदास प्रभु रहे मौन ह्वै यह कहि कहि पछिताहीं॥
राग सारंग में निबद्ध सूरदास जी का यह पद भाव प्रधान है। श्रीकृष्ण जब ब्रज छोडकर मथुरा आ गये तो वहाँ गोपियाँ उनके वियोग में बहुत व्याकुल हो गयीं। कृष्ण ने अपने सखा उद्धव को उन्हें समझाने के लिये ब्रज भेजा। ब्रज से लौटकर उद्धव जी ने सारा हाल सुनाया। उद्धव ने जब श्रीकृष्ण को ब्रज की दशा का हाल सुनाया तो श्रीकृष्ण भाव विभोर होकर बोले, हे सखा! ब्रज को मैं भुला नहीं सकता। हंससुता (यमुना) का वह तट, लताओं से आच्छादित मार्गो की वह छाया का सुख मैं कैसे भूल सकता हूं? मैं उन गायों व बछडों को भी नहीं भूल सकता और न ही उस गोशाला को जहाँ मैं गायों का दूध दूहता था। हम सब ग्वाल बाल एक दूसरे की बांहों में बांहें डालकर कोलाहल मचाते हुए नाचा करते थे। उस सुख को भी मैं कैसे भुला दूं? हे उद्धव! यह मथुरा नगरी यद्यपि स्वर्ण, मणि-मुक्ताओं से बनी हुई है, लेकिन जब भी मुझे ब्रज के उस सुख की याद आती है तब मन भर आता है और मुझे तन की भी सुधि नहीं रहती। मैंने अनेक प्रकार की अनंत लीलाएं कीं, जिन्हें मैया यशोदा ने बहुत ही निभाया है। सूरदास कहते हैं कि श्रीकृष्ण जब उद्धव से ब्रज के उस सुख की बात बतला रहे थे तब बात कहते-कहते बीच में ही मौन हो जाते थे। ऐसा कहकर मन ही मन पश्चाताप भी करने लगते थे।
मुरली सब्द सुनावन
कहा दिन ऐसे ही चलि जैहैं।
सुनि सखि मदन गुपाल आंगन में ग्वालनि संग न ऐहैं॥
कबहूं जात पुलिन जमुना के बहु विहार बिधि खेलत।
सुरति होत सुरभी संग आवत पुहुप गहे कर झेलत॥
मृदु मुसुकानि आनि राख्यो जिय चलत कह्यो है आवन।
सूर सुदिन कबहूं तौ ह्वै है मुरली सब्द सुनावन॥
राग सोरठा पर आधारित इस पद में सूरदास जी ने गोपियों की भावनाओं को व्यक्त किया है। एक सखी दूसरी सखी से पूछती है कि क्या यह दिन ऐसे ही व्यतीत हो जाएंगे? क्या मदन गोपाल अब ग्वालों के संग हमारे आंगन में नहीं आएंगे? क्या अब यमुना के किनारे वह नाना प्रकार की क्रीडाएं नहीं करेंगे? उनकी वह चेष्टाएं बार-बार स्मरण हो आती हैं, जब वह गायों के साथ हाथों में पुष्पों को उछालते हुए आते थे। उनकी वह मधुर मुस्कान अब भी मेरे मानस-पटल पर है। हे सखी! मेरा मन तो कहता है कि श्यामसुंदर एक दिन अवश्य आएंगे। सूरदास कहते हैं कि वह सखियां विचार कर रही हैं कि वह शुभ दिन कब आएगा जब हम श्रीकृष्ण की मुरली का मधुर स्वर सुन पाएंगी।
भाव भगति है जाकें
रास रस लीला गाइ सुनाऊं।
यह जस कहै सुनै मुख स्त्रवननि तिहि चरनन सिर नाऊं॥
कहा कहौं बक्ता स्त्रोता फल इक रसना क्यों गाऊं।
अष्टसिद्धि नवनिधि सुख संपति लघुता करि दरसाऊं॥
हरि जन दरस हरिहिं सम बूझै अंतर निकट हैं ताकें।
सूर धन्य तिहिं के पितु माता भाव भगति है जाकें॥
विहाग राग पर आधारित इस पद में सूरदास कहते हैं कि मेरा मन चाहता है कि मैं भगवान् श्रीकृष्ण की रसीली रास लीलाओं का नित्य ही गान करूं। जो लोग भक्तिभाव से कृष्ण लीलाओं को सुनते हैं तथा अन्य लोगों को भी सुनाते हैं उनके चरणों में मैं शीश झुकाऊं। वक्ता व श्रोता अर्थात् कृष्ण लीलाओं का गान करने व अन्य को सुनाने के फल का मैं और क्या वर्णन करूं। इन सबका फल एक जैसा ही होता है। तब फिर इस जिह्वा से क्यों न कृष्ण लीलाओं का गान किया जाए। जो दीनभाव से इसका गान करता है, उसे अष्टसिद्धि व नव निधियां तथा सभी तरह की सुख-संपत्ति प्राप्त होती है। जिनका मन निर्मल है या जो हरिभक्त हैं, वह सबमें ही हरि स्वरूप देखते हैं। सूरदास कहते हैं कि वे माता-पिता धन्य हैं जिनकी संतानों में हरिभक्ति का भाव विद्यमान है।

मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं गोकुल गाँव के ग्वालन। जो पसु हौं तो कहा बसु मेरो चरौं नित नन्द की धेनु मंझारन। पाहन हौं तो वही गिरि को जो धरयौ कर छत्र पुरन्दर धारन। जो खग हौं बसेरो करौं मिल कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन।।

रसखान का अपने आराध्य के प्रति इतना गम्भीर लगाव है कि ये प्रत्येक स्थिति में उनका सान्निध्य चाहते हैं। चाहे इसके लिये इन्हें कुछ भी परिणाम सहना पडे। इसीलिये कहते हैं कि आगामी जन्मों में मुझे फिर मनुष्य की योनि मिले तो मैं गोकुल गाँव के ग्वालों के बीच रहने का सुयोग मिले। अगर पशु योनि मिले तो मुझे ब्रज में ही रखना प्रभु ताकि मैं नन्द की गायों के साथ विचरण कर सकूँ। अगर पत्थर भी बनूं तो भी उस पर्वत का बनूँ जिसे हरि ने अपनी तर्जनी पर उठा ब्रज को इन्द्र के प्रकोप से बचाया था। पक्षी बना तो यमुना किनारे कदम्ब की डालों से अच्छी जगह तो कोई हो ही नहीं सकती बसेरा करने के लिये।

इसी प्रकार रसखान ने समस्त शारीरिक अवयवों तथा इन्द्रियों की सार्थकता तभी मानी है, जिनसे कि वे प्रभु के प्रति समर्पित रह सकें।

जो रसना रस ना बिलसै तेविं बेहु सदा निज नाम उचारै।
मो कर नीकी करैं करनी जु पै कुंज कुटीरन देहु बुहारन।
सिध्दि समृध्दि सबै रसखानि लहौं ब्रज-रेनुका अंग सवारन।
खास निवास मिले जु पै तो वही कालिन्दी कूल कदम्ब की डारन।।

रसखान अपने आराध्य से विनती करते हैं कि मुझे सदा अपने नाम का स्मरण करने दो ताकि मेरी जिव्हा को रस मिले। मुझे अपने कुंज कुटीरों में झाडू लगा लेने दो ताकि मेरे हाथ सदा अच्छे कर्म कर सकें। ब्रज की धूल से अपना शरीर संवार कर मुझे आठों सिध्दियों का सुख लेने दो। और यदि निवास के लिये मुझे विशेष स्थान देना ही चाहते हो प्रभु तो यमुना किनारे कदम्ब की डालों से अच्छी जगह तो कोई हो ही नहीं, जहाँ आपने अनेकों लीलाएं रची हैं।

रसखान के कृष्ण की बाललीला में उनके बचपन की अनेकों झाँकियां हैं।

धूरि भरै अति सोभित स्याम जु तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।
खेलत खात फिरै अँगना पग पैंजनी बाजती पीरी कछौटी।
वा छवि को रसखान विलोकत बारत काम कला निज कोठी।
काग के भाग बडे सजनी हरि हाथ सौं ले गयो रोटी।।

बालक श्यामजू का धूल से सना शरीर और सर पर बनी सुन्दर चोटी की शोभा देखने लायक है। और वे पीले वस्त्रों में, पैरों में पायल बांध माखन रोटी खेलते खाते घूम रहे हैं। इस छवि पर रसखान अपनी कला क्या, सब कुछ निछावर कर देना चाहते हैं। तभी एक कौआ आकर उनके हाथ से माखन-रोटी ले भागता है तो रसखान कह उठते हैं कि देखो इस निकृष्ट कौए के भाग्य भगवान के हाथ की रोटी खाने को मिली है।

कृष्ण के प्रति रसखान का प्रेम स्वयं का तो है ही मगर वह गोपियों का प्रेम बन कृष्ण की बाल्यावस्था से यशोदा नन्द बाबा के प्रेम से आगे जा समस्त ब्रज को अपने प्रेम में डुबो ले जाता है। उनकी शरारतों की तो सीमा नहीं। वे गोपियों को आकर्षित करने के लिये विविध लीलाएं करते हैं जैसे कभी बाँसुरी के स्वरों से किसी गोपी का नाम निकालते हैं। कभी रास रचते हैं, कभी प्रेम भरी दृष्टि से बींध देते हैं।

अधर लगाई रस प्याई बाँसुरी बजाय,
मेरो नाम गाई हाय जादू कियौ मन में।
नटखट नवल सुघर नन्दनवन में
करि कै अचेत चेत हरि कै जतम मैं।
झटपट उलटि पुलटी परिधान,
जानि लागीं लालन पे सबै बाम बन मैं।
रस रास सरस रंगीली रसखानि आनि,
जानि जोर जुगुति बिलास कियौ जन मैं।

एक गोपी अपनी सखि से कहती है कि कृष्ण ने अपने अधरों से रस पिला कर जब बाँसुरी में मेरा नाम भर कर बजाया तो मैं सम्मोहित हो गई। नटखट युवक कृष्ण की इस शरारत से अचेत मैं हरि के ध्यान में ही खो गई। और बांसुरी के स्वर सुन हर गोपी को लगा कि उसे कृष्ण ने बुलाया है तो सब उलटे सीधे कपडे ज़ल्दी जल्दी पहन, समय का खयाल न रख वन में पहुँच गईं। तब रंगीले कृष्ण ने वहाँ आकर रासलीला की और नृत्य संगीत से आनंद का वातावरण बना दिया।

रंग भरयौ मुस्कात लला निकस्यौ कल कुंज ते सुखदाई।
मैं तबहीं निकसी घर ते तनि नैन बिसाल की चोट चलाई।
घूमि गिरी रसखानि तब हरिनी जिमी बान लगैं गिर जाई।
टूट गयौ घर को सब बंधन छुटियो आरज लाज बडाई।।

गोपी अपने हृदय की दशा का वर्णन करती है। जब मुस्कुराता हुआ कृष्ण सुख देने वाले कुंज से बाहर निकला तो संयोग से मैं भी अपने घर से निकली। मुझे देखते ही उसने मुझ पर अपने विशाल नेत्रों के प्रेम में पगे बाण चलाए मैं सह न सकी और जिस प्रकार बाण लगने पर हिरणी चक्कर खा कर भूमि पर गिरती है, उसी प्रकार मैं भी अपनी सुध-बुध खो बैठी। मैं सारे कुल की लाज और बडप्पन छोड क़ृष्ण को देखती रह गई।

रसखान ने रासलीला की तरह फागलीला में भी कृष्ण और गोपियों के प्रेम की मनोहर झाँकियां प्रस्तुत की हैं।

खेलत फाग लख्यौ पिय प्यारी को ता मुख की उपमा किहिं दीजै।
दैखति बनि आवै भलै रसखान कहा है जौ बार न कीजै।।
ज्यौं ज्यौं छबीली कहै पिचकारी लै एक लई यह दूसरी लीजै।
त्यौं त्यौं छबीलो छकै छबि छाक सौं हेरै हँसे न टरै खरौ भीजै।।

एक गोपी अपनी सखि से राधा-कृष्ण के फाग का वर्णन करते हुए बताती है - हे सखि! मैं ने कृष्ण और उनकी प्यारी राधा का फाग खेलते हुए देखा है, उस समय की उस शोभा को कोई उपमा नहीं दी जा सकती। और कोई ऐसी वस्तु नहीं जो उस स्नेह भरे फाग के दृश्य पर निछावर नहीं की जा सके। ज्यों ज्यों सुन्दरी राधा चुनौती दे देकर एक के बाद दूसरी पिचकारी चलाती हैं। वैसे वैसे छबीला कृष्ण उनके उस रंग भरे रूप को छक कर पीता हुआ वहीं खडा मुस्कुरा कर भीगता रहता है।

रसखान के भक्ति काव्य में अलौकिक निगुर्ण कृष्ण भी विद्यमान हैं। वे कहते हैं -

संभु धरै ध्यान जाकौ जपत जहान सब,
ताते न महान और दूसर अब देख्यौ मैं।
कहै रसखान वही बालक सरूप धरै,
जाको कछु रूप रंग अबलेख्यौ मैं।
कहा कहूँ आली कुछ कहती बनै न दसा,
नंद जी के अंगना में कौतुक एक देख्यौ मैं।
जगत को ठांटी महापुरुष विराटी जो,
निरजंन, निराटी ताहि माटी खात देख्यौ मैं।

शिव स्वयं जिसे अराध्य मान उनका ध्यान करते हैं, सारा संसार जिनकी पूजा करता है, जिससे महान कोई दूसरा देव नहीं। वही कृष्ण साकार रूप धार कर अवतरित हुआ है और अपनी अद्भुत लीलाओं से सबको चौंका रहा है। यह विराट देव अपनी लीला के कौतुक दिखाने को नंद बाबा के आंगन में मिट्टी खाता फिर रहा है।

गावैं गुनि गनिका गंधरव औ नारद सेस सबै गुन गावत।
नाम अनंत गनंत ज्यौं ब्रह्मा त्रिलोचन पार न पावत।
जोगी जती तपसी अरु सिध्द निरन्तर जाहि समाधि लगावत।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावत।

जिस कृष्ण के गुणों का गुणगान गुनिजन, अप्सरा, गंर्धव और स्वयं नारद और शेषनाग सभी करते हैं। गणेश जिनके अनन्त नामों का जाप करते हैं, ब्रह्मा और शिव भी जिसके स्वरूप की पूर्णता नहीं जान पाते, जिसे प्राप्त करने के लिये योगी, यति, तपस्वी और सिध्द निरतंर समाधि लगाए रहते हैं, फिर भी उस परब्रह्म का भेद नहीं जान पाते। उन्हीं के अवतार कृष्ण को अहीर की लडक़ियाँ थोडी सी छाछ के कारण दस बातें बनाती हैं और नाच नचाती हैं।

एक और सुन्दर उदाहरण -

वेही ब्रह्म ब्रह्मा जाहि सेवत हैं रैन दिन,
सदासिव सदा ही धरत ध्यान गाढे हैं।
वेई विष्णु जाके काज मानि मूढ राजा रंक,
जोगी जती व्हैके सीत सह्यौ अंग डाढे हैं।
वेई ब्रजचन्द रसखानि प्रान प्रानन के,
जाके अभिलाख लाख लाख भाँति बाढे हैं।
जसुदा के आगे वसुधा के मान मोचन ये,
तामरस-लोचन खरोचन को ठाढे हैं।

कृष्ण की प्राप्ति के लिये सारा ही जगत प्रयत्नशील है। ये वही कृष्ण हैं जिनकी पूजा ब्रह्मा जी दिन रात करते हैं। सदाशिव जिनका सदा ही ध्यान धरे रहते हैं। यही विष्णु के अवतार कृष्ण जिनके लिये मूर्ख राजा और रंक तपस्या करके सर्दी सहकर भी तपस्या करते हैं। यही आनंद के भण्डार कृष्ण ब्रज के प्राणों के प्राण हैं। जिनके दर्शनों की अभिलाषाएं लाख-लाख बढती हैं। जो पृथ्वी पर रहने वालों का अहंकार मिटाने वाले हैं। वही कमल नयन कृष्ण आज देखो यशोदा माँ के सामने बची खुची मलाई लेने के लिये मचले खडे हैं।

गोकुल-महावन


कृष्ण जिनका नाम है गोकुल जिनका धाम है
ऐसे श्री भगवान को बारम्बार प्रणाम है॥
        यह पवित्र स्थल मथुरा से 15 किमी की दूरी पर श्रीयमुनाजी के पार स्थित है। यह ब्रज का बड़ा ही महत्वपूर्ण स्थल है। यहीं रोहिणी जी ने श्री बलराम जी को जन्म दिया। बलराम जी देवकी जी के सातवे गर्भ में थे जिन्हें योगमाया ने कर्षित कर रोहिणी के गर्भ में डाल दिया था। मथुरा में कृष्ण जी के जन्म के पश्‍चात् कंस के सभी सैनिकों को निद्रा आ गयी थी एवं वासुदेव जी की बेड़ियाँ खुल गयी थी। तब वासुदेव जी श्री कृष्ण को गोकुल में नन्दराय जी के यहाँ छोड़ आये। श्री नन्दराय जी के घर लाला का जन्म हुआ है, धीरे धीरे यह बात समस्त गोकुल में फ़ैल गयी। सभी गोपगण, गोपियाँ, गोकुलवासी खुशियाँ मनाने लगे। सभी घर, गलियाँ चौक आदि सजाये जाने लगे एवं बधाइयाँ गायी जाने लगीं। श्री कृष्ण और बलराम जी का पालन पोषण यही हुआ एवं दोनों अपनी लीलाओं से सभी को मुग्ध करते रहे। जहाँ घुटनों के बल चलते हुए दोनों भाई को देखना गोकुलवासियों को सुख देता था तो वहीं माखन चुराकर श्री कृष्ण जी ब्रजगोपिकाओं के दुखों को हर लेते थे। गोपियाँ कृष्ण जी को छाछ का लालच देकर नचाती थीं तो कृष्ण जी बांसुरी की धुन से सभी को मंत्र मुग्ध कर देते थे। भगवान श्री कृष्ण ने गोकुल में रहते हुए पूतना, शकटासुर, तृणावर्त आदि असुरों को मोक्ष प्रदान किया।

ब्रज सार


खादिरवन : यह ब्रज के १२ वनों में से एक है। यहाँ श्री कृष्ण-बलराम सखाओं के साथ तर-तरह की लीलाएं करते थे। यहाँ पर खजूर के बहुत वृक्ष थे। यहाँ पर श्री कृष्ण गोचारण के समय सभी सखाओं के साथ पके हुए खजूर खाते थे। श्री कृष्ण जी ने यहाँ वकासुर नामक असुर का वध किया था।
बिहारवन : यहाँ पर श्री बिहारी जी के दर्शन और बिहार कुण्ड है। यहाँ पर रासबिहारी श्री कृष्ण ने राधिका जी सहित गोपियों के साथ रासविहार किया एवं अनेक लीला-विलास किए थे। श्री यमुना जी के पास यह एक सघन रमणीय वन है। यहाँ के गौशाला में आज भी कृष्णकालीन गौवंश के दर्शन होते हैं।
फ़ालेन: यह भक्त प्रह्‍लाद की जन्मस्थली है।
कामई : यह अष्ट सखियों में प्रमुख विशखा सखी जी का जन्मस्थान है।
खेलनवन : यहाँ गोचारण के समय श्री कृष्ण-बलराम सखाओं के साथ विभिन्न प्रकार के खेल खेलते थे। श्री राधा जी भी यहाँ अपनी सखियों के साथ खेलने आतीं थीं, इन्हीं सब कारणों से इस स्थान का नाम खेलनवन पड़ा।
बिहारवन : यहाँ पर श्री बिहारी जी के दर्शन और बिहार कुण्ड है। यहाँ पर रासबिहारी श्री कृष्ण ने राधिका जी सहित गोपियों के साथ रासविहार किया एवं अनेक लीला-विलास किए थे। श्री यमुना जी के पास यह एक सघन रमणीय वन है। यहाँ के गौशाला में आज भी कृष्णकालीन गौवंश के दर्शन होते हैं।
खेलनवन : यहाँ गोचारण के समय श्री कृष्ण-बलराम सखाओं के साथ विभिन्न प्रकार के खेल खेलते थे। श्री राधा जी भी यहाँ अपनी सखियों के साथ खेलने आतीं थीं, इन्हीं सब कारणों से इस स्थान का नाम खेलनवन पड़ा।
कामई : यह अष्ट सखियों में प्रमुख विशखा सखी जी का जन्मस्थान है।
फ़ालेन: यह भक्त प्रह्‍लाद की जन्मस्थली है।
बहुलावन : बहुलावन ब्रज के बारह वनों में एक है। श्री हरि की बहुला नाम की पत्‍नि हमेशा यहाँ विराजमान रहती हैं। बहुलावनकुण्ड में स्थित पद्मवन में स्नान पान करने वाले व्यक्ति को बहुत पुण्य प्राप्त होता है क्योंकि भगवान विष्णु लक्ष्मी जी सहित यहाँ निवास करते हैं। एक बार इस स्थान पर बहुला नामक एक गाय को शेर ने घेर लिया था। वह उसे मारना चाहता था लेकिन गाय ने शेर को आश्वादन दिया कि वह अपने बछड़े को दूध पिलाकर लौट आयेगी। इस पर विश्वास कर सिंह वहाँ खड़ा रहा। कुछ समय पश्चात जब गाय अपने बछड़े को दूध पिलाकर लौट आई तो शेर गाय के सत्यव्रत से बहुत प्रभावित हुआ, उसने गाय को छोड़ दिया। यहाँ बलराम कुण्ड एवं मानसरोवर कुण्ड दर्शनीय हैं।
तोषग्राम : यह श्री कृष्ण के प्रिय सखा तोष का गाँव है। तोष नामक गोप नृत्यकला में बहुत निपुण थे। श्री कृष्ण जी ने नृत्य की शिक्षा इन्हीं से प्राप्त की थी। यहाँ तोष कुण्ड है जिसके जल को पीकर ग्वालबाल, गौएँ, श्री कृष्ण-बलराम को बड़ा ही संतोष होता था। यहाँ गोपालजी तथा राधारमण जी की स्थलियाँ दर्शनीय हैं।
दतिहा :  यहाँ श्री कृष्ण जी ने दन्तवक्र नामक असुर का वध किया था। यहाँ महादेव जी का एक चतुर्भुज विग्रह है।
गरुड़ गोविन्द : छटीकरा के पास ही गरुड़ गोविन्द जी का मन्दिर है। एक दिन श्री कृष्ण गोचारण करते हुए सखाओं के साथ यहाँ विभिन्न प्रकार की क्रीड़ाएं कर रह थे। उन्होंने श्रीदाम सखा को गरुड़ बनाया और उसकी पीठ पर स्वयं इस प्रकार बैठ गये जैसे मानो स्वयं लक्ष्मीपति नारायण गरुड़ की पीठ पर सवार हों। यहाँ पर गरुड़ बने हुए श्रीदाम तथा गोविन्द जी का दर्शन होता है।
जसुमती (जसौंदी) : यह श्रीराधाकुण्ड-वृन्दावन मार्ग पर स्थित है। श्री कृष्ण की सखी जसुमती ने यहाँ सूर्य भगवान की उपासना की थी। यहाँ सूर्य कुण्ड दर्शनीय है।
बसोंति(बसति) :  यह श्री कृष्ण की सखी बसुमति का स्थान है। उसने बसंत पंचमी को भगवान की अराधना की थी। यहाँ बसन्त कुण्ड एवं कदम्ब खण्डी है।
बेलवन : श्रीलक्ष्मी जी ने वृन्दावन में महारास देखने की अभिलाषा प्रकट की। लेकिन उन्हें महारास में प्रवेश नहीं दिया गया। वह आज भी इस स्थल पर वृन्दावन में महारास देखने के लिये तपस्या कर रही हैं। यहाँ पर पौष मास के प्रत्येक गुरुवार को मेला लगता है।
कुश स्थली (कोसी) : यह नन्दराय जी की कोष स्थली है। इसी स्थल को ब्रज की द्वारिका पुरी कहते हैं। यहाँ पर रत्‍नाकर सागर, माया कुण्ड तथा गोमती कुण्ड है।
मानसरोवर : एक बार श्री राधा रानी भगवान श्री कृष्ण जी से रूठ कर यहाँ विराजी थीं। यहाँ उनके नेत्रों के ही दर्शन होते हैं। यहाँ पर दो कुण्ड हैं मान कुण्ड और कृष्ण कुण्ड। मान कुण्ड श्री राधा रानी जी के नयनों से प्रवाहित अश्रुओं से बना है। यह स्थान श्री हित हरिवंश जी को अत्यन्त प्रिय था और वे यहाँ प्रतिदिन आते थे।
मांट गाँव : मांट शब्द का अर्थ दधि मंथन आदि के लिए मिट्टी से निर्मित बड़े-बड़े पात्रों से है। यह स्थल मांटों (मटका) के निर्माण का केन्द्र था। यमुना किनारे स्थित मांटवन ब्रज का प्रमुख सघन वन था।
ऐंचादाउजी : एक बार बलराम जी श्री कृष्ण जी के कहने पर द्वारिका से ब्रज में अपने मैया और बाबा से मिलने आये। इसके पश्‍चात उनके मन में महारास की इच्छा प्रकट हूई तो उन्होंने सभी सखियों को इस स्थल पर बुलाया। लेकिन यमुना जी नहीं आयीं क्योंकि बलराम जी उनके जेठ लगते थे। तो बलराम जी यमुना जी को अपने हल से खींचकर  यहाँ लाये। तभी से इस स्थान पर यमुना उल्टी बह रहीं हैं। यमुना जी को हल से खींच कर लाने के कारण ही इसका नाम ऐंचा दाऊजी पड़ गया।
अक्षय वट : जब ब्रज में महारास हो रहा था तो सभी देवताओं ने इसे देखने की इच्छा प्रकट की। भगवान श्री कृष्ण जी ने उन्हें इस वृक्ष पर विराजमान होकर रास देखने को कहा। अतः सभी देवता अपने लोकों से रास देखने के लिये इसी वृक्ष पर विराजमान होते हैं। यह अक्षय वट कृष्णकालीन है एवं सदैव हरा भरा रहता है। इसे भाण्डीरवट भी कहते हैं। यहाँ पर बल्देव जी ने प्रलम्बासुर का वध किया था।
भाण्डीरवन : गर्ग संहिता के अनुसार एक बार नन्दबाबा कन्हैया को लेकर शाम के समय भ्रमण पर जा रहे थे, रास्ते में अंधेरा होने पर कन्हैया रोने लगे। बाबा ने उनको चुप कराने की बहुत कोशिश की, तब तक अंधेरा और घना हो चुका था, फ़िर बाबा श्रीराधाजी का स्मरण करने लगे तो श्री जी अपने पूर्ण रूप से प्रकट हुई,  बाबा ने लाला को श्री जी की गोदी में दे दिया और श्री जी की स्तुति के बाद वहां से चले आये। उनके जाने के बाद भगवान अपने किशोर रूप में आ गये, ब्रह्मा जी ने दोनों का विवाह् सम्पन्न कराया।
चीरघाट : सभी गोपियाँ मार्गशीर्ष माह में भगवान श्री कृष्ण को वर रूप में पाने के लिये कात्यायनी देवी जी का व्रत रखती थीं एवं यमुना में स्नान करती थी। एक बार कृष्ण जी ने उनके वस्त्र हरण कर लिये एवं कदम्ब के वृक्ष पर चढ़ गये। तब सभी गोपियों ने भगवान श्री कृष्ण से उनके वस्त्र लौटाने को कहा। तब भगवान श्री कृष्ण जी ने उनको यह शिक्षा दी कि नदी में वरुण देवता का निवास होता है अतः नदी में निर्वस्त्र होकर स्नान नहीं करना चाहिये इससे वरुण देवता का अपमान होता है।